Saturday, May 16, 2026

Tuesday, February 17, 2026

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दूरदर्शन भोपाल के बहुचर्चित प्रोग्राम नमस्कार mp में संवाद, संचार और संस्कृति पर सार्थक चर्चा हुई। साथी पूर्वा, पूजा जी और टीम का धन्यवाद।

Thursday, July 17, 2025

मोबाइल से चटका पीहर का मोह

 प्रो. मनोज कुमार

अभी अभी मेरी पत्नी अपने मोबाइल फोन से फारिग हुई है. बीस मिनट से ज्यादा हो गये होंगे बतियाते हुए. पूछने पर पता चला कि अपनी मम्मी से बातें कर रही थी. क्या खाया, क्या पकाया, कौन आया और कौन गया से लेकर वो सारी बातें जो महीनों बाद पीहर पहुंच कर कभी बिटिया अपनी अम्मां से करती थी, अब हर दिन बल्कि हर पहर हो रही है. कोसों का फासला खत्म सा हो गया है. जब मन किया, मोबाइल का बटन दबाया और सेकंड में बातों का सिलसिला शुरू. न आने जाने की परेशानी और न साज समान की. अब बीवियां पीहर जाने का नाम नहीं लेती हैं. उनका पीहर तो मोबाइल हो गया है. कभी पीहर जाने के लिये उतावली रहने वाली बीवियां अब नहीं जाने का बहाना ढूंढ़ती हैं. पतिदेव जिद करें कि कुछ दिनों के लिये पीहर हो आओ तो वे उन पर उलटे अहसान मढ़ते हुए कहेंगी आपके और बच्चों का रूटीन डिस्टर्ब हो जाता है, इसलिये वे नहीं जाना चाहतीं.

मोबाइल ने सुविधा तो दी है लेकिन कई चीजें खत्म भी कर दी है. किसी ब्याहता का पीहर जाना, केवल पीहर जाना नहीं होता था बल्कि इसके पीछे एक सामाजिक ताना-बाना होता था. पति-पत्नी के बीच की एकरसता को खत्म करने का यह एक अवसर होता था. रिश्तों की गर्माहट को महसूस करने का अवसर मिलता था. परिवार में ताजगी का अहसास होता था. इनके जाने और उनके नहीं रहने के बीच का फर्क महसूस होता था, यह फर्क अब नहीं रहा. एक मोबाइल ने जिंदगी की ताजगी को छीन लिया है. जब मोबाइल नहीं था तो बीवी के पास पीहर जाने का उत्साह होता था. उसे यह जान लेने की उत्सुकता होती थी कि उसकी गैरहाजिरी में अम्मां ने क्या क्या खरीदा है? ब्याहने के बाद अम्मां की मोहब्बत कम तो नहीं हुई, यह जांचने की कोशिश भी अनजाने में बिटिया करती थी. कदाचित अम्मां ने अपनी बहू के लिये बिटिया से कुछ अधिक खरीद लिया तो बिटिया तुनक कर कहती- हां, अब तो मैं परायी हो गयी हूं, अपनी बहू के लिये सब करेगी. बिटिया की इस मासूम शिकायत पर अम्मां न्यौछावर हो जाती. उसे मनाती और बताती कि ऐसा नहीं है.

रूठने और मनाने की इस गर्माहट को भी मोबाइल ने छीन लिया है. पीहर जाकर बिटिया अपने बचपन की यादों को टटोलती, संगी-सहेलियों के बारे में पूछती लेकिन अब मोबाइल इनका पता तो नहीं देगा? पीहर से लौटती बिटिया के आंखों में लरजते आंसू अम्मां को भी रूला जाते थे यह आंसू तब तक थमे रहते जब तक कि बिटिया वापस लौट आने की बात नहीं कहती. पीहर से ससुराल के रास्ते भी बहू के लौट जाने की प्रतीक्षा करते रहते. पतिदेव को अपनी पत्नी के लौट आने का बेसब्री से इंतजार रहता. जिस पत्नी से वह तंग आ चुका होता है, उसके नहीं रहने पर उसे तनहाई डसने लगती है. पत्नी के लौट आने पर पति थोड़ा नाराज दिखता है और पत्नी मनुहार करने बैठ जाती है. अपने घर के बिखर जाने का गम भी उसे रहता था. बात बात में पति और बच्चों को ताना कि उसके नहीं रहने पर घर की क्या हालत बना दी है.

रूठने, मनाने, शिकायत और प्रार्थना अब बीती जमाने की बातें रह गयी है क्योंकि बिटिया अब नहीं जाती है पीहर. महीनों बाद पीहर जाकर मां की खरीदी चीजें, बचपन की यादें और आने जाने वाले का ब्यौरा सुनने और सुनाने का काम भी इस मोबाइल ने खत्म कर दिया है. रोज मां से खबर मिल जाती है. क्या लिया और कितने में लिया, कौन आया, कौन गया और इधर से भी मां को रिपोर्ट हो जाती है कि आज सब्जी में क्या बना और कल की क्या प्लानिंग है. ब्याह के शुरूआती दिनों में पीहर छूट जाने का दुख होता है लेकिन समय गुजर जाने के बाद पति का घर प्यारा लगने लगता है. जो थोड़ी कसर इस मोबाइल से रह गयी थी, वह कसर इंटरनेट ने पूरी कर दी. कैमरे लगाया और पूरा पीहर अपने घर में बैठे घूूम लिया, देख लिया. मां की सूरत भी देख ली और पीहर की दीवारों का रंग भी जान लिया. बिटिया अब नहीं जाती है पीहर.

Sunday, November 14, 2021

 जनजातीय गौरव दिवस 15 नवम्बर के लिए विशेष

बिरसा मुंंडा के सपनों को सच करता मध्यप्रदेश 

मनोज कुमार

मध्यप्रदेश के इतिहास में एक और दिन 15 नवम्बर ऐतिहासिक दिन के रूप में लिखा जाएगा जब जनजातीय गौरव दिवस के रूप में बिरसा मुंडा की जयंती का जयघोष होगा। ह्दयप्रदेश मध्यप्रदेश हमेशा से बड़े दिल का रहा है और रांची के इस महान वीर सपूत बिरसा की जयंती मध्यप्रदेश की भूमि पर आयोजित है। यह एक महज आयोजन नहीं है बल्कि इस बात का संदेश है कि स्वाधीनता संग्राम के लिए सर्वस्व त्याग करने वाले वीर योद्धा किसी क्षेत्र विशेष के ना होकर सम्पूर्ण भारत वर्ष का गौरव हैं। मध्यप्रदेश एक नजीर बन रहा है कि एक राष्ट्र की संकल्पना को कैसे व्यवहार में लाया जाए। यह अवसर भी माकूल है जब हम स्वाधीनता संग्राम के 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं तब इन वीर योद्धाओं का स्मरण समाज का दायित्व बनता है। इन वीरों के स्मरण से उनके कार्यों और बलिदान की जो राष्ट्रीय भावना थी, उससे युवा पीढ़ी को अवगत कराना है। यह मध्यप्रदेश के लिए गौरव की बात है कि बिरसा मुंंंडा की जयंती मनाने का अवसर हमें मिल रहा है।

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अंग्रेजों को चने चबाने वाले वीर नायकों से मध्यप्रदेश का स्वर्णिम इतिहास लिखा गया है। जिन जनजातीय वीर योद्धाओं का हम स्मरण करते हैं उनमें भीमा नायक, टंट्या मामा, खाज्या नायक, संग्राम शाह, शंकर शाह, रघुनाथ शाह, रानी दुर्गावती, बादल भोई, राजा भभूत सिंह, रघुनाथ मंडलोई भिलाला, राजा ढिल्लन शाह गोंड, राजा गंगाधर गोंड, सरदार विष्णुसिंह उइके जैसे अनेक चिंहित नाम हैं। लेकिन सत्य यह भी है कि अनेक ऐसे नाम हैं जिनका उल्लेख कभी इतिहास में नहीं किया गया। स्वाधीनता संग्राम के 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान पर इतिहास का पुर्नलेखन किया जा रहा है। अब तक जो इतिहास लिखा गया, उसमें स्वतंत्रता संग्राम के अनेक बहुमूल्य घटनाओंं और नामों को जानबूझकर विलोपित कर दिया गया। इतिहास लेखन की इस नवीन प्रकल्प को प्रभावी बनाने के लिए जनजातीय समाज के वीर योद्धाओं का स्मरण करना आवश्यक हो जाता है। यह वही अवसर है जब दबा दिये गए, छिपा दिए गए तथ्य सामने आते हैं और हम इतिहास को नए सिरे से लिखते हैं।

मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह सरकार ने जनजातीय समाज के लिए ऐसे अनेक कार्य किये हैं जो उन्हें मुख्यधारा में लाते हैं। पूर्ववर्ती सरकारों ने सुनियोजित ढंग से जनजातीय समाज को कभी मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बनने दिया। उन्हें इस बात का भय था कि जनजातीय समाज शिक्षित हो जाएगा, आत्मनिर्भर हो जाएगा तो उसके भीतर अपने अधिकारों के लिए लडऩे की शक्ति आ जाएगी। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान इस बात को बेहतर ढंग से जानते थे लेकिन उन्हें अपनी सरकार की नीतियों पर भरोसा है और उनका मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबको बराबर का अधिकार मिलना चाहिए। इस दृष्टि के साथ जनजातीय समाज के लिए ना केवल शिक्षा की व्यवस्था की बल्कि उनके लिए रोजगार के बेहतर अवसर मुहय्या कराया। जिन जनजातीय बच्चों को स्कूल जाना नसीब नहीं था, वे बच्चे आज विदेश में पढ़ रहे हैं। प्राथमिक शिक्षा जिनके लिए कभी नहीं थी और थी भी तो बेहद औपचारिक वे बच्चे इंजीनियरिंग और मेडिकल के साथ एमबीए जैसे विषयों में दक्षता हासिल कर अपनी नई दुनिया गढ़ रहे हैं। जनजाति समाज पर प्रकृति का आशीर्वाद है। प्रकृति से सीधे जुड़े होने के कारण उनके भीतर नैसर्गिक कला संसार बसा हुआ है। शिवराजसिंह सरकार ने इसे पहचाना और देश-दुनिया का मंच दिया जहां आज ना वे अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं बल्कि आय का उत्तम स्रोत भी उन्हें मिल गया है।

वीर योद्धा बिरसा मुंडा की कहानी पढ़ते हैं तो ज्ञात होता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व भी जनजाति समाज सूदखोरों के चंगुल में फंसा था। आज भी हालात में बहुत कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया है। सात दशक की यात्रा का विवेचन करें तो स्पष्ट हो जाता है कि मध्यप्रदेश की जनजाति समुदाय को सूदखोरों से मुक्त करने के लिए कोई गंभीर और प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह सरकार ने इस दिशा में प्रभावी पहल की है। मध्यप्रदेश सरकार का क्रांतिकारी फैसला साहूकारों से जनजाति समुदाय को मुक्त कराना है तथा ऋणमुक्त कर उन्हें अनावश्यक तनाव से मुक्ति दिलाना भी सरकार की प्राथमिकता में है। मध्यप्रदेश अनुसूचित जनजाति साहूकार विनियम 1972 को और अधिक प्रभावी बनाकर साहूकारों के लिए लायसेंस लेना अनिवार्य करने के साथ ब्याज की राशि निर्धारित की जा चुकी है और निर्धारित ब्याज राशि से अधिक लेने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही की जाएगी।

पूर्ववर्ती सरकारों ने जनजातीय समाज को आगे आने नहीं दिया। उनकी कला-कौशल को समाज के समक्ष नहीं रखा जिसकी वजह से हमेशा से आत्मनिर्भर रहा जनजातीय समुदाय स्वयं को निरीह महसूस करने लगा था। बीते डेढ़ दशक में मध्यप्रदेश सरकार ने इस समाज के दर्द को समझा और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई नए प्रकल्प तैयार किये। मोदी सरकार के साथ कदमताल करती मध्यप्रदेश सरकार ने लोकल से वोकल और एक जिला, एक प्रोडक्ट पर कार्य कर इन जनजातियों को आगे बढऩे का अवसर दिया। मध्यप्रदेश के जनजाति समूह खेती करने के साथ वनोपज संग्रह, पशुपालन, मत्स्य पालन, हस्त कला यथा बांस शिल्प, काष्ठ शिल्प, मृदा शिल्प एवं धातु शिल्प का कार्य करते हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने ऐलान किया है कि देवारण्य योजना के अंतर्गत वनोत्पाद और वन औषधि को बढ़ावा दिया जाएगा एवं वन उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य में खरीदा जाएगा।  जनजातीय समुदाय की कला कौशल को मध्यप्रदेश सरकार ने ना केवल दुनिया को बताया बल्कि बाजार भी उपलब्ध कराया ताकि उनके उत्पाद का उचित मूल्य मिल सके। 

मध्यप्रदेश में जनजातीय समाज की बेहतरी के लिए जो कार्य किये जा रहे हैं, वह बिरसा मुंडा के स्वप्र को सच करने की कोशिश है। योद्धा बिरसा मुंडा भी जनजाति समाज को शोषणमुक्त देखना चाहते थे। वे चाहते थे कि समाज में समरसता हो और जनजाति समाज को मुख्यधारा में स्थान मिले। रोटी और रोजगार के साथ शिक्षा का बेहतर विकल्प मिले। युवा शिक्षित और आत्मनिर्भर हों और उनके मन में देशप्रेम का भाव हो। मध्यप्रदेश बिरसा मुंडा के सपनों को सच कर रहा है क्योंकि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान सबका साथ, सबका विकास के साथ हमारा मध्यप्रदेश गढ़ रहे हैं। बिरसा मुंडा की जयंती के माध्यम से मध्यप्रदेश में जनजातीय समाज की बेहतरी के लिए किये जा रहे कार्यों से पूरा देश परिचित हो सकेगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं)

Monday, May 3, 2021

बेमानी है प्रेस फ्रीडम की बातें

मनोज कुमार

तीन दशक पहले संयुक्त राष्ट्र संघ ने 3 मई को विश्व प्रेस फ्रीडम डे मनाने का ऐलान किया था. तब से लेकर आज तक हम इसे पत्थर की लकीर मानकर चल रहे हैं. इन तीन दशकों में क्या कुछ हुआ, इसकी मीमांसा हमने नहीं की. पूरी दुनिया में पत्रकार बेहाल हैं और प्रेस बंधक होता चला जा रहा है. खासतौर पर जब भारत की चर्चा करते हैं तो प्रेस फ्रीडम डे बेमानी और बेकार का ढकोसला लगता है. दशकवार जब भारत में पत्रकारिता पर नजर डालें तो स्थिति खराब नहीं बल्कि डरावना लगता है. लेकिन सलाम कीजिए हम पत्रकारों की साहस का कि इतनी बुरी स्थिति के बाद भी हम डटे हुए हैं. हम पत्रकार से मीडिया में नहीं बदल पाये इसलिए हमारे साहस को चुनौती तो मिल रही है लेकिन हमें खत्म करने की साजिश हमेशा से विफल होती रही है. इस एक दिन के उत्सवी आयोजन से केवल हम संतोष कर सकते हैं लेकिन फ्रीडम तो कब का खत्म हो चुका है बस समाज की पीड़ा खत्म करने का जज्बा ही हमें जिंदा रखे हुए है.

भारत में पत्रकारिता के पतन की शुरूआत और उसकी स्वतंत्रता खत्म करने का सिलसिला साल 1975 में ही शुरू हो गया था. आपातकाल के दरम्यान जो कुछ घटा और जो कुछ हुआ, वह कई बार बताया जा चुका है. उसे दोहराने का अर्थ समय और स्पेस खराब करना है. लेकिन एक सच यह है कि पत्रकारिता इसके बाद से दो हिस्सों में बंटती चली गई. लोगों ने मिशन से बाहर आकर इसे प्रोफेशन मान लिया. अखबारों और पत्रिकाओं की संख्या मे इजाफा होना शुरू हो गया. कल तक जिनके लिए किसी स्कूल में शिक्षक बन जाना आसान था, उन्हें यह भी आसान लगा कि पत्रकार बन जाओ. ना शिक्षा की पूछ-परख और ना ही अनुभव का कोई लेखा-जोखा. मैं कुछ ऐसे पत्रकारों को जानता हंू जो शीर्ष संस्थाओं के प्रमुख हैं लेकिन जमीनी पत्रकारिता से उनका कोई वास्ता नहीं रहा. डिग्री हासिल की और सुविधाजनक ढंग से बड़े पदों पर आसीन हो गए. नयी पीढ़ी उन्हें प्रखर पत्रकार और आचार्य संबोधित करने लगे. मिश्री घुली बातों से वे चहेते बन गए और आज जिस बात का हम रोना रो रहे हैं, वह इन्हीं महानुभावों की वजह से उत्पन्न हुआ है. इसमें तथाकथित प्रखर पत्रकार और आचार्य बन चुके रसमलाई में लिपटे लोगों की गलती तो थोड़ी है. इससे बड़ी गलती उन दिग्गज लोगों की है जो जानते हुए भी उन्हें आगे बढ़ाने में लग रहे.

बेहिसाब पत्रकारिता के शिक्षण संस्थान शुरू हो रहे हैं. यहां पढऩे वाले विद्यार्थियों को पत्रकारिता को छोडक़र शेष सारी विधायें सिखायी जाती हैं. डिग्री और बेहतर नौकरी के साथ सुविधाजनक जिंदगी की चाहत लिए पत्रकारिता के नौनिहाल सवाल करना भी नहीं जानते हैं. संवाद और अध्ययन से उनकी कोसों दूरी है. कभी किसी पर इनकी खबर का केवल इंट्रों देख लीजिए तो माथा पीट लेंगे. पू्रफ रीडिंग जैसी बुनियादी सबक कभी इन्हें सिखाया नहीं गया. जुम्मा-जुम्मा चार साल की पत्रकारिता और वरिष्ठ पत्रकार का खिताब. इन सालों में एक खबर ऐसी नहीं कि जो छाप छोड़ गई हो. हालांकि निराशाजनक स्थिति के बावजूद मैं कह सकता हूं कि कुछेक विद्यार्थी हैं जो पत्रकारिता करने आये थे और पत्रकारिता कर रहे हैं. पत्रकारिता शिक्षण संस्थाओं में अध्यापन के दौरान उन्हें इस बात का भी ज्ञान नहीं दिया गया कि पत्रकारिता और मीडिया क्या है? आज पत्रकारिता दिवस है और सोशल मीडिया में निश्चित रूप से मीडिया को शुभकामनाएं दी जा रही होंगी. प्रेस की स्वतंत्रता के मायने यह नहीं है कि आपको लिखने की आजादी है. प्रेस स्वतंत्रता का अर्थ है आप सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता करें. पेजथ्री की पत्रकारिता से बाहर आकर एक बार विद्यार्थी, पराडकर, गांधी और तिलक को पढ़ें. मैं यह भी नहीं कहता कि आधुनिक संचार माध्यमों में वह सबकुछ संभव है जो पराधीन भारत की पत्रकारिता में था लेकिन जैसे सृृष्टि ने मां बनाया तो सदियां बदल जाने के बाद भी मां ही है, वैसे ही माध्यम बदल जाए, विकास हो जाए लेकिन पत्रकारिता की आत्मा जिंदा रहना चाहिए. पत्रकारिता हमारी अस्मिता है. 

जब हम प्रेस स्वतंत्रता की बात करते हैं तो इन दिनों कोरोना काल में जो कुछ घट रहा है, वह हमें आईना दिखाने के लिए बेहतर है. देशभर में पत्रकारों को फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मानने के लिए सरकारों को अर्जियां दी जा रही हैं. फिर राजशाही की तरह सरकार हम पर एहसान कर कहती है कि फलां सरकार ने पत्रकारों को फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मान लिया है. समाज में शुचिता और सकरात्मकता का भाव उत्पन्न करने की जिम्मेदारी पत्रकारिता की. सरकार के प्रयासों को लोगों तक पहुंचाने की अपेक्षा पत्रकारिता से. लेकिन पत्रकारों को फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मानने के लिए सरकारों से बात करना होगी. क्या सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है कि वह हमारा ध्यान रखे? इस स्थिति के लिए भी हम दोषी हैं. रोहित सरदाना की मृत्यु हो जाती है तो हम खेमें में बंट जाते हैं. हम भूल जाते हैं कि वो भी एक पत्रकार था और हम सब भी. यह भी सच है कि जिस अखबार, पत्रिका या चैनल में काम करेेंगे, उसकी नीति के अनुरूप बोलना होगा. यह बंधन सबके लिए है. हमारी आपस की बैर और खेमेबाजी राजनीतिक दलों के लिए सुविधा पैदा करती है. आज सचमुच में प्रेस स्वतंत्र होता तो सरकारें आगे आकर फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मानने के लिए मजबूर होती लेकिन दुर्भाग्य से हम खेमेबाज पत्रकार हैं. इसलिए सब बातें बेमानी है.

उम्मीद कीजिए और भरोसा रखिए कि देश के कोने कोने से कोराना के चलते जो पत्रकार जान गंवा रहे हैं, उनसे हम सीख लें. एक साथ खड़े हो जाएं. जिस दिन हम यह साहस कर पाएंगे हर प्रबंधन को आगे आकर वेतन आयोग की शर्ते मानना होगी और सरकारों को भी. लेकिन इसके लिए इंतजार करना होगा कि क्योंकि एक ऐसी अदृश्य शक्ति है जो हमें इसमें या उसमें बांट रही है.   


Sunday, December 6, 2015

सहिष्णुता-असहिष्णुता का विलाप


मनोज कुमार
 सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का यह मुद्दा उन लोगों का है जिनके पेट भरे हुए हैं। जो दिन-प्रतिदिन टेलीविजन के पर्दे पर या अखबार और पत्रिकाओं के पन्ने पर पक्ष लेते हैं दिखते हैं अथवा देश और सरकार को कोसते हैं। ये वही आमिर खान हैं जिन्होंने कभी भोपाल में कहा था कि उनकी मां उनसे कहती हैं कि बेटा, चार पैसा कमा ले। बेचारे गरीब आमिर को इस बार उनकी पत्नी कहती हैं कि देश असहिष्णु हो चला है, चलो देश छोड़ देते हैं। आमिर अपनी निजी बातें सार्वजनिक मंच से शेयर करते हैं. आमिर का यह विलाप देश की चिंता में नहीं है, यह अपने गिरते हुए फिल्मी बाजार को सम्हालने की कोशिश हैं। देश आमिर से पूछना चाहता है कि आमिर तुम स्टार नहीं होते तो यह बातें किस सार्वजनिक मंच से कहने का अवसर मिलता? कौन तुम्हें बोलने का मौका देता और मिल भी जाता तो कौन सुनता? चलो, आमिर कुछ देर के लिए मान भी लेते हैं कि सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता के मुद्दे से तुम जख्मी हो और पत्नी की बात देशवासियों को अपना परिवार मानकर उनसे शेयर कर रहे हो। अब सवाल यह है कि देश में लगभग हर राज्य में किसान आत्महत्या कर रहे हैं तो क्या एक देशभक्त आमिर का कर्तव्य नहीं है कि वह किसानों के बीच जाए और उनके दर्द बांटे, देशवासियों से किसानों की पीड़ा शेयर करे और उनकी मदद के लिए कोई उपाय तलाशे। यह शायद तुम नहीं करोगे. तुम अपनी ड्यूटी और राईट्स भूल जाते हो क्योंकि किसानों की पीड़ा हरने का काम तो सरकार और तंत्र का है, एक सेलिबे्रटी का तो है नहीं।  
आमिर एक बात और बता दूं। मेरे और मुझ जैसे लाखों लोग इस देश में होंगे जिनके घरों में मां, पत्नी, बहन, भाभी, चाची और मौसी के साथ साथ बच्चे भी कई मुद्दों पर बात करते हैं लेकिन इनके दिमाग में गलती से देश तो क्या शहर छोडऩे का ख्याल भी नहीं आता है। ऐसा भी नहीं है कि जहां हम सब लोग रहते हैं, वहां परेशानी नहीं है लेकिन परेशानी से भागने के बजाय हम उस समस्या का हल ढूंढऩा जानते हैं। हमें अपना राइट्स भी पता है और ड्यूटी भी क्योंकि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। हम अपनी निजी बातें सार्वजनिक रूप से शेयर कर अपना और समाज का मजाक नहीं बनाते हैं।  आमिर ध्यान रखो, यह भारत है और भारत देश कभी सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का विलाप नहीं करता है। इस देश ने 1947 से लेकर 2015 के इस दौर तक अनेक बदलाव देखे हैं लेकिन कभी किसी ने देश छोडऩे की बात नहीं की।  इस देश का आम आदमी देश तो दूर, अपना शहर और अपना मोहल्ला  तक नहीं छोड़ना चाहता है. पुश्तैनी मकान की परम्परा इस बात को साबित करती है.  
आमिर के इस विलाप को हवा देते हुए एक दूसरा सेलिब्रिटी शाहरूख खान इस बयान के खिलाफ अपना बयान दे डालता है। इसका चरित्र भी आमिर से अलग नहीं है। उम्रदराज होते इन अभिनेताओं को पता है कि जल्द ही बाजार इन्हें खारिज करने जा रहा है तब यह इस तरह की बातें बोल कर खुद का मार्केट बनाये रखने की जुगत में लग जाते हैं। सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता इनके लिए कोई मुद्दा नहीं है। इनका मुद्दा है करोड़ों की लागत से बनी फिल्में पीटे नहीं और करोड़ों कमा ले जाएं। शाहरूख जो सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता की बात कर रहे हैं, वो याद कर लें कि खेल के मैदान में कितने सहिष्णु रहे हैं ?  दरअसल इनका काम है लोगों का मनोरंजन करना, वही करें और देश की चिंता छोड़ दे. चिंता करना भी है तो एक भारतीय बनकर करें, हीरो बनकर नहीं.    
अनुपम खेर को भी आप इस लाइन से बाहर नहीं कर सकते हैं क्योंकि इस फिल्मी बाजार का वो भी हिस्सा है। वो भी चाहता है कि सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता के मुद्दे के बहाने कुछ नाम पक्का कर लिया जाए तो कभी न कभी राजदरबार में प्रवेश का अवसर मिले। यह और बात है कि वो मीडिया से बात करते समय इससे सहजता से ना कर जाते हे. बावजूद अचानक से वे संवेदनशील हो जाते हैं और उन्हें अपनी ड्यूटी और राईट्स दोनों समझ आने लगता है. सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता पर जुलूस-जलसा निकालने लगते हैं. जिन कश्मीरी पंडितो की पीड़ा का वे इजहार कर रहे है, दुख जता रहे है, क्या कभी उनके बारे में कभी कुछ किया? कभी उनके हक़ के लिए लड़ाई लड़ी? शायद नहीं। केवल टेलीविज़न के परदे पर ही उनका दुख दिखता है. काश! सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता से बाहर आकर देशवासियों के पक्ष में अनुपम खड़े हो पाते। हम उम्मीद कर रहे है कि "सारांश " का वह बूढ़ा बाप परदे से बाहर आकर अपने चरित्र को साकार करेगा।
सेलिब्रेटियों की सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता पर चिंता महज मगरमच्छ के आंसू हैं। मेरी सहमति उनसे भी है जो लगातार चीख-चीख कर असहिष्णुता का विलाप कर रहे है. एक आम आदमी का लगातार मंहगाई से टूटने को क्या कहेंगे? अपराधों से जो डरा हुआ है, उसकी चिंता कौन करेगा? आप सब बुद्दिजीवी हैं, आप  सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता को समझते है लेकिन मेरे जैसा आम आदमी इन बातों को बहुत नहीं समझता है. मेरा मानना है कि आप सब हमारे बीच आये,  सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता के बारे में हमें बताये। आम आदमी जानना चाहेगा कि मंहगाई, बेरोजगारी, अपराध, असुरक्षा से बड़ा असहिष्णुता का कोन सा मुद्दा है। उसकी रूचि यह भी जानने में होगी कि जो लोग असहिष्णुता के मुद्दे पर मोर्चे पर है, क्या उन लोगो को आम आदमी के मुद्दे पर सड़क पर नहीं आना चाहिए?  भूखा पेट केवल रोटी ना मिलने पर असहिष्णु होता है, भरा पेट इस बात को क्या जाने और समझे। यह वो  लोग है जिन्होंने कभी रेल की जनरल बोगी  में सफर नहीं किया और ना ही सरकारी अस्पताल में इलाज कराया। इन्हे तो इस बात का भी इल्म नहीं कि सरकारी स्कूल बच्चों को पढ़ाने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं.   
दुर्भाग्य की बात है कि सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का विलाप करने वाले लोगों ने अपने ही एक और हीरा जैसा कलाकार नाना पाटेकर से कुछ नहीं सीखा? नाना महाराष्ट्र के किसानों के बीच गये और अखबार या टेलीविजन में खुद को स्टार बताने के बजाय उनके बीच जाकर अपनी हैसियत से ज्यादा मदद कर आये। ऐसे और भी लोग है, जो सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता को लेकर बेकरार नहीं हैं बल्कि अपनी जवाबदारी समझ कर मदद में जुटे हुए है.  क्या दिल पर हाथ रखकर सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता के मुद्दे पर देश को बदनाम करने वाले आमिर, अनुपम और शाहरूख बता सकते हैं कि ऐसा कोई पराक्रम उन्होंने कभी किया हो? शायद नहीं।
माफ करना मेरे वो दोस्त, जिनकी मोहब्बत आमिर, अनुपम और शाहरूख से होगी, उन्हें यह बात नागवार गुजरे लेकिन मुझे पता है कि आप मेरी बातों से सहमत ना हों लेकिन असहमति की गुंजाईश ही मैंने कहां छोड़ी है। सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का प्राथमिक तौर पर  मुद्दा बेमानी लगता है क्योंकि जिस देश में दाल के भाव 2सौ रुपये किलो बिक रहा हो, प्याज और आलू खरीदने की आम आदमी की ताकत जवाब दे रही हो, वहां सहिष्णुता अथवा असहिष्णुता का मुद्दा केवल सियासी और बौद्धिक जुगाली है। एकबारगी यह मान भी लिया जाए कि सरकार का व्यवहार असहिष्णु है तो उसके खिलाफ आवाज उठनी चाहिए लेकिन इसके पहले आम आदमी को उसकी हैसियत जीने का हक नहीं मिलना चाहिए?  यह देश भारत है जिसने अंग्रेजों को भगा कर दम लिया, उसके लिये असहिष्णुता कोई बडा मुद्दा नहीं है. यह भी नहीं भूलना चाहिये कि इसी देश ने आपतकाल को सिरे से खारिज कर दिया था. जो लोग असहिष्णु है, उन्हें चुनाव में जनता बाहर का दरवाज़ा दिखा देती है. 

Thursday, March 5, 2015

एक धर्म की बिटिया

मनोज कुमार
बिटिया हो जाना ही किसी बेटी का धर्म है. बिटिया का एक ही धर्म होता है बिटिया हो जाना. बिटिया का विभिन्न धर्म नहीं होता, उसकी कोई जात या वर्ग भी नहीं होता, वह एक मायने में अमीर या गरीब भी नहीं होती है. बिटिया, सिर्फ और सिर्फ बिटिया ही होती है. हिन्दू परिवारों में पैदा हुई बेटियों को भी पराया होना होता है तो मुस्लिम, सिक्ख और इसाई परिवार भी इसी परम्परा का निर्वाह करते हैं. बेटियों को लेकर इनमें से किसी का भी धर्म और वर्ग का चरित्र अलग नहीं है. बिटिया को लेकर सबकी दृष्टि एक सी है और वह दृष्टि है बिटिया पराया धन है. यहां तक कि बिटिया को लेकर आलीशान कोठी में रहने वाले धन्ना सेठ जो सोचता है, वही सोच एक आम आदमी के मन की भी होती है. संसार के निर्माण के साथ ही बेटी चीख रही है, चिल्ला रही है कि वह एक वस्तु नहीं है. वह धन भी नहीं है और न ही सम्पत्ति लेकिन परम्परा के खूंटे से बंधी बिटिया एक सोची-समझी साजिश के तहत पराया धन बना दी गई. 
अभी रेल का सफर करते समय इस बात का अनुभव हुआ कि बिटिया का कोई धर्म नहीं होता है. मैंने 14 घंटे के सफर में इस बात की तलाश करता रहा कि किसी एक बिटिया का तो धर्म पता चल सके लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. बिटिया को पराये घर जाना है तो उसे घर का हर काम सीखना होगा, भाई और पिता को खिलाने के बाद खाना ही उसका धर्म है. पिता और भाई के खाने के बाद बचा हुआ वह खाना खाती है और कई बार तो उनके हिस्से के बचे और बासी खाना बिटिया के नसीब में आता है. पीहर से सीखा और ससुराल में यह उसकी नियती बन जाती है. परदे में रहना, चुप रहना और दूसरों की खुशी में हंसना-मुस्कराने वाली बिटिया सुघड़ है, संस्कारी है. इस संस्कारी और एक धर्म का निर्वाह करने वाली बिटिया का जज्बात दहेज के लिये जला देने वालों के लिये कोई मोल नहीं रखता है, यह भी दिल दुखा देने वाली बात है कि एक बलात्कारी बिटिया का धर्म नहीं पूछता. उसके लिये उसका शरीर ही धर्म होता है. हां, इतना जरूर होता है कि सियासी फायदे के लिये कभी-कभार बलात्कार की शिकार बिटिया की जाती चिन्हित की जाती है. यह चिनहारी भी उस लाभ के लिये कि यह दिखाया जा सके कि दुष्कर्म की शिकार बिटिया भी किसी धर्म से आती है. संसार भर में बिटिया के लिये एक ही धर्म है कि उसका बिटिया हो जाना.
    बिटिया को पराया कहने पर मुझे आपत्ति है लेकिन उसे धन कहने पर थोड़ी कम आपत्ति क्योंकि बिटिया का तो कोई मोल है लेकिन बेटों का क्या करें? बेटों का तो अपना धर्म है, वह अमीर भी है और गरीब भी. उसके साथ वर्ग और वह जाति के जंजाल में भी उलझा हुआ है. हिन्दू धर्म के लिये बेटा होने का अर्थ घर का चिराग है तो मुस्लिम, सिक्ख और ईसाई भी इसी तरह सोचते हैं. बेटा उनके वंश को बढ़ाता है इसलिये वह पराया नहीं होता है लेकिन उसे कभी पराया न सही, स्वयं के घर का धन भी कहला नहीं पाया. बेटा न तो पराया होता है और न कभी धन बन पाया. ऐसा क्यों नहीं होता, इस पर भी जब मैंने सोचा तो लगा कि बेटे की हैसियत दिखती तो बड़ी है लेकिन हकीकत में उसकी औकात दो कौड़ी की होती है. जीवन भर वह पराये धन की खाता है. इस बारे में हमारे एक मित्रवत रिश्तेदार भाई अवधेश कहते हंै कि आप तो अधिकतम 25 साल में बरी हो जाएंगे, शायद इससे ज्यादा एक या दो वर्ष में. बिटिया का हाथ पीला करेंगे और निश्चिंत हो जाएंगे लेकिन हमारे लिये तो बेटा जीवन भर की घंटी की बना हुआ है. पहले पालो, शिक्षा दिलाओ, फिर नौकरी की चिंता करो और बाद में बेटे का ब्याह करो. थोड़े साल बाद मां-बाप पराये हो जाते हैं. मां-बाप समाज के नियमों के चलते बिटिया को पराया कर देते हैं और बेटा मां-बाप को अपने लिये पराया कर देता है. तमाम विकास की बातों, महिलाओं की हिस्सेदारी की बाते और जाने क्या क्या जतन किये गये लेकिन जब परिणाम जांचा गया तो पाया कि जतन तो बिटिया के नाम पर था लेकिन फैसला बेटे के पक्ष में हो गया. न तो इन 14 घंटों के सफर में मैं बिटिया का धर्म तलाश कर पाया और न इस पचास साल की उम्र में बिटिया को उसकी पहचान दिला पाया. जो लोग इसे पढ़ रहे होंगे तो उनसे मेरा आग्रह यही होगा कि जब समय मिले तो बिटिया के हक की तलाश करें, मदद करें और हो सके तो बिटियाओं के लिये उनका अपना धर्म तलाश कर सकें जहां वे स्वतंत्र हों, उनकी अपनी पहचान हो. 

Friday, July 25, 2014

छोटी ही रहना चाहती हूं पापा...



-मनोज कुमार 
अखबार पढ़ते हुये अचानक नजर पड़ी कि कुछ दिनों बाद फादर्स डे है। मन में जिज्ञासा आयी और लगा कि अपनी बिटिया से पूछूं कि वो इस फादर्स डे पर क्या करने वाली है। मैंने सहज भाव से पूछ ही लिया कि बेटा, थोड़े दिनों बाद फादर्स डे आने वाला है। तुम अपने फादर अर्थात मेरे लिये क्या करने वाली हो? वह मेरा सवाल सुनकर मुस्करायी और मेरे सामान्य ज्ञान को बढ़ाते हुये कहा कि हां, पापा मुझे पता है कि फादर्स डे आने वाला है। अच्छा आप बताओ कि आप मेरे लिये क्या करने वाले हो? मैंने कहा कि दिन तो मेरा है, फिर मैं क्यों तु हारे लिये कुछ करने लगा। तु हें मेरे लिये करना चाहिये? इसके बाद हम बाप-बेटी के बीच जो संवाद हुआ, वह एक दार्शनिक संवाद  जरूर था लेकिन डे मनाने वालों के लिये सीख भी है। बेटी ने कहा कि पहली बात तो यह कि मैं अभी आपकी इनकम पर अपना भविष्य बना रही हूं और जो कुछ भी करूंगी आपके जेब से निकाल कर ही करूंगी। ऐसे में आपके लिये कुछ करने का मतलब आपको खुश करने के बजाय दुखी करना होगा क्योंकि जितने पैसों से मैं आपके लिये उपहार खरीदूंगी, उतने में आप हमारी कुछ जरूरतें पूरी कर सकेंगे। तो इसका मतलब यह है कि जब तुम कमाने लगोगी तो फादर्स डे सेलिब्रेट करोगी। अपने पापा के लिये उपहार खरीदोगी? इस बार भी बिटिया का जवाब अलग ही था। नहीं पापा, मैं चाहे जितनी बड़ी हो जाऊं, जितना कमाने लगूं लेकिन कभी इतनी बड़ी न हो पाऊं कि अपने पापा को उपहार देने की मेरी हैसियत बने। जिस पापा ने अपनी नींद खोकर मेरी परिवरिश की, जिस पापा ने अपनी जरूरतों को कम कर मेरी जरूरतों को पूरा करने में पूरा समय और श्रम लगा दिया, जिस पापा ने मेरे सपनों को अपना सपना मानकर मुझे बड़ा किया, उस पापा को भला मैं क्या दे सकती हूं। और पापा ही क्यों, मम्मी, दादाजी, दादीजी सब तो मिलकर मुझे बनाने की कोशिश कर, फिर भला मैं कैसे आप लोगों के लियेे उपहार खरीदने की हि मत कर सकती हूं। 
बिटिया की बातों को सुनकर मेरी आंखें भर आयी। मुझे लगा कि मैंने जो कुछ किया, वह निरर्थक नहीं गया। बेटी के भीतर वह सबकुछ मैंने समाहित कर दिया, जो मुझे मेरे पिता से मिला था। मुझे लगा कि फादर्स डे पर इससे अच्छा कोई उपहार हो भी नहीं सकता है। जब मां-बाप अपने बच्चों से हारते  हैं तो सही मायने में विजेता होते हैं। हारते हुयेे माता-पिता को सही मायने में खुशी मिलती है क्योंकि बच्चों की जीत ही माता-पिता की असली जीत है। हमारे समाज में ये जो डे मनाने का रिवाज चल पड़ा है और यह रिवाज भारतीय नहीं बल्कि यूरोपियन देशों की देन है। भौतिक जरूरतों की चीजों में उनके रिश्ते बंधे होते हैं और वे हर रिश्तों को वस्तु से तौलते हैं लेकिन भारतीय मन भावनाओं की डोर से बंधा होता है। वस्तु हमारे लिये द्वितीयक है, प्रथम भावना होती है और आज मेरी बेटी ने जता दिया कि वह जमाने के साथ भाग रही है्र दौड़ रही है लेकिन अपनी संस्कृति और संस्कार को सहेजे हुये। अपनी भावनाओं के साथ, अपने परिजनों की भावनओं की कद्र करते हुये। वह बाजार जाकर कुछ सौ रुपयों के तोहफों से भावनाओं का व्यापार नहीं कर रही है। यह मेरे जैसे पिछड़ी सोच के बाप के लिये अनमोल उपहार है। 
भारतीय समाज में भी डे मनाने की पुरातन पर परा है। हम लोग यूरोपियन की तरह जीवित लोगों के लिये डे का आयोजन नहीं करते हैं बल्कि उनके हमारे साथ नहीं रहने पर करते हैं। उनकी मृत्यु की तिथि पर उनके पसंद का भोजन गरीबों को खिलाया जाता है, वस्त्र इत्यादि गरीबों में वितरित किया जाकर उनकी आत्मा की प्रसन्नता के लिये करते हैं, इसे हम पितृपक्ष कहते हैं। जीते जी हम उन्हें भरपूर स मान देते हैं और मरणोपरांत भी उनका स्थान हमारे घर-परिवार के बीच में होता है। दुर्भाग्य से हम यूरोपियन संस्कृति के साथ चल पड़ हैं। सक्षम पिता या माता का डे तो मनाते हैं लेकिन वृद्ध होते माता-पिता को वृद्वाश्रम पहुंचाने में देर नहीं करते हैं। बाजार जिस तरह अनुपयोगी चीजों का सेल लगाता है या चलन से बाहर कर देता है, वही हालत यूरोपियन समाज में रिश्तों का है, भावनाओं का है। हम भी इसी रास्ते पर चल पड़े हैं। पालकों के पास धन है, साधन है, सक्षम हैं तो दिवस है और नहीं तो उनके लिये दिल तो क्या घर पर स्थान नहीं है। मेरी गुजारिश है उन बच्चों माता-पिता को बाजार की वस्तु बनाने के बजाय उन्हें अपना स्नेह दें। उनकी भावनाओं का खयाल रखें और एक दिन फादर्स डे, मदर्स डे के बजाय पूरे साल का हर दिन उनके लिये समर्पित करें। यही हमारी पर परा और संस्कृति है और यही भारतीय समाज की धरोहर भी। 

Sunday, July 28, 2013

भाव भरी भूमि
-मनोज कुमार
अभी बीते 23 जुलाई को अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की पुण्यभूमि पर जाने का मुझे अवसर मिला. यह दिन मेरे लिये किसी उत्सव से कम नहीं था. कभी इस पुण्यभूमि को भाबरा के नाम से पुकारा जाता था किन्तु अब इस नगर की पहचान अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद के रूप में है. मध्यप्रदेश शासन के आदिमजाति कल्याण विभाग के सहयोग से राज्य के आदिवासी बाहुल्य जिलों में सामुदायिक रेडियो केन्द्रों की स्थापना की पहली कड़ी में यहां दो वर्ष पहले रेडियो वन्या की स्थापना हुई. 23 जुलाई को रेडियो वन्या के दूसरी सालगिरह पर मैं बतौर रेडियो के राज्य समन्वयक के नाते पहुंचा था. मैं पहली दफा इस पुण्य धरा पर आया था. इस धरा पर अपना पहला कदम रखते ही जैसे मेरे भीतर एक कंपन सी हुई. कुछ ऐसा मन में लगा जिसे अभिव्यक्त कर पाना मुश्किल सा लग रहा है. एक अपराध बोध भी मेरे मन को घर कर गया था. भोपाल से जिस वाहन से हम चंद्रशेखर आजाद नगर पहुंचे थे, उसी वाहन में बैठकर मैं और मेरे कुछ साथी आजाद की कुटिया की तरफ रवाना हुये. कुछ पल बाद ही मेरे मन में आया कि मैं कोई अनैतिक काम कर रहा हूं. उस वीर की भूमि पर मैं कार में सवार होकर उसी तरह चल रहा हूं जिस तरह कभी अंग्रेज चला करते थे. मन ग्लानि से भर गया और तत्काल अपनी भूल सुधार कर वाहन से नीचे उतर गया. वाहन से नीचे उतरते ही जैसेे मन हल्का हो गया. क्षणिक रूप से भूल तो सुधार लिया लेकिन एक टीस मन में शायद ताउम्र बनी रहेगी.
बहरहाल, मेेरे रेडियो स्टेशन पर कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद लगभग हजार विद्यार्थियों की बड़ी रैली अमर शहीद चंद्रशेखर की जयकारा करते हुये निकली तो मन खुश हो गया. परम्परा को आगे बढ़ाते देखना है तो आपको चंद्रशेखर नगर जरूर आना होगा. वीर शहीद की कुटिया को सरकार की तरफ से सुंदर बना दिया गया है. इस कुटिया में मध्यप्रदेश स्वराज संस्थान संचालनालय की ओर उनकी पुरानी तस्वीरों का सुंदर संयोजन किया गया है. इस कुटिया में प्रवेश करने से पूर्व ही एक अम्मां मिलेंगी जो बिना किसी स्वार्थ कुटिया की रखवाली करती हैं, जैसे वे अपने देश को अंग्रेजों से बचा रही हों. इस कुटिया के भीतर वीर शहीद चंद्रशेखर आजाद की आदमकद प्रतिमा है जिसे देखते ही लगता है कि वे बोल पड़ेंगे हम आजाद थे, आजाद रहेेंगे. सब-कुछ किसी फिल्म की रील की तरह आंखों के सामने से गुजरती हुई प्रतीत होता है. जब मैं प्रतिमा निहार रहा था तभी एक लगभग 30-35 बरस का युवा अपनी छोटी सी बिटिया को लेकर कुटिया में आया और बिना समय गंवाये नन्हीं बच्ची को गोद में उठाकर उसे इतना ऊपर उठाया कि बिटिया शहीद का तिलक कर सके. उसने यही नहीं किया बल्कि बिटिया को शहीद के पैरों पर ढोक लगाने के लिये प्रेरित किया. नन्हीं सी बच्ची को शहीद और भगवान में अंतर नहीं मालूम हो लेकिन एक पिता के नाते उस युवक की जिम्मेदारी देखकर मन भाव से भर गया. 
एकाएक मन में आया कि काश, भारत आज भी गांवों का देश होता तो अभाव भले ही उसे घेरे होते किन्तु भाव तो नहीं मरते. बिलकुल जैसा कि मैंने चंद्रशेखर आजाद की नगरी में देखा. विकास के दौड़ में हम अपना गौरवशाली अतीत को विस्मृत कर रहे हैं लेकिन यह छोटा सा कस्बानुमा आज भी उस गौरवशाली इतिहास को परम्परा के रूप में आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित कर रहा है. परम्परा के संवर्धन एवं संरक्षण की यह कोशिश ही सही मायने में भारत की तस्वीर है. मैं यह बात बड़े गौरव के साथ कह सकता हूं कि देश का ह्दयप्रदेश मध्यप्रदेश ने भारत के स्वाधीनता संग्राम में जितना बड़ा योगदान दिया और इनके शहीदों को जिस तरह समाज ने सहेजा है, वह बिराला ही उदाहरण है. यह वही चीज है जिसे हम भारत की अस्मिता कहते हैं, यह वही चीज है जिससे भारत की दुनिया में पहचान है और शायद यही कारण है कि तमाम तरह की विसंगितयां, विश्व वक्रदृष्टि के बावजूद भारत बल से बलवान बना हुआ है.
दुख इस बात है कि विकास की अंधी दौड़ से अब चंद्रशेखर आजाद नगर भी नहीं बचा है. मकान, दुकान पसरते जा रहे हैं. वीर शहीद के नाम पर राजनीति अब आम हो रही है. हालांकि इसे यह सोच कर उबरा जा सकता है कि विकास होगा तो यह लालच बढ़ेगा और लालच बढ़ेगा तो विसंगतियांं आम होंगी लेकिन यह बात भी दिल को सुकून देेने वाली हैं कि चंद्रशेखर आजाद की नगरी में 23 जुलाई का दिन हर वर्ष दीपावली से भी बड़े उत्सव की तरह मनाया जाता है. अमर शहीद चंद्रशेखर को मेरा कोटिश: प्रणाम.

Saturday, May 18, 2013

कलम की विनम्रता



हिंदी पत्रकारिता दिवस पर 

मनोज कुमार

तीस मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाते हैं। ये  दिवस है, खासकर पत्रकारिता के लिये। यहां मैं मीडिया शब्द से परहेज करने की कोशी करूंगा क्योंकि मेरा मानना है कि मीडिया का अर्थ पत्रकारिता से एकदम जुदा है। बहरहाल, हम पत्रकारिता के संदर्भ में बात करेंगे। दादा माखनलाल की विशव  प्रसिद्व रचना है पुशप  की अभिलाशा। इस कविता में उन्होंने फूल की विन्रमता का बखान किया है और इससे जुड़ी बात कलम की मैं कहता हूं। कलम भी आपको विनम्रता सिखाती है। आप देखेंगे कि आमतौर पर कलम नीचे की तरफ होती है अर्थात वह विनम्र है। पत्रकारिता भी विनम्रता सिखाती है और विनम्र पत्रकारिता ही दुनिया बदलने की ताकत रखती है। तलवार नीचे की तरफ होगी तो वह भीरूपन का परिचायक होगी किन्तु कलम ऊपर की तरफ होगी तो उसकी अकड़ दिखेगी। क्या कलम अकड़ दिखा सकती है? नहीं, कभी नहीं। कलम की प्रकृति रचने की है, सिखाने की है और रचियता हमेषा विनम्र होता है। जो लोग आस्तिक नहीं हैं वे भी इस बात को मानेंगे कि ईष्वर, अल्लाह, ईषु, गुरूनानक किसी ने भी, कहीं भी विनयषील व्यवहार के अलावा कोई सीख नहीं दी है। 

जब हम यह मानते हैं कि कलम विन्रम है तो भला हममें विनम्रता क्यों नहीं आना चाहिए। पत्रकारिता का दायित्व समाज के किसी भी दायित्व से बड़ा है। दूसरे दायित्व कम नहीं हो सकते हैं किन्तु उनमें कहीं न कहीं, लाभ की लालसा बनी होती है किन्तु पत्रकारिता में लाभ का कोई लोभ नहीं होता है। पत्रकारिता सहज रूप् से एक सुंदर, विचारवान और विकसित समाज की रचना करने की कोषिष है। कुछ लोग इस बात को हजम नहीं कर पाएंगे कि आज जब चौतरफा पत्रकारिता के व्यवसायिक हो जाने की बात चल रही है, कदाचित प्रमाणित भी हो चुकी है तब मेरा यह कहना केवल काल्पनिक बातें हो सकती हैं। मेरा उन सभी लोगों से आग्रह है कि वे इसे दूसरी नजर से देखें। पत्रकारिता तो आज भी नफा-नुकसान से परे है। आप एक पत्रकार हैं तो आप खबर लिखते हैं समाज के लिये किन्तु जिस कागज पर खबर छपती है वह वस्तु है और वस्तु का सौदा होता है। आपकी लिखी खबर षब्द सत्ता है और इसकी कोई कीमत नहीं होती है। पत्रकार का लाभ इतना ही होता है कि उसे जीवनयापन के लिये वेतन के रूप् में कुछ हजार रुपये मिल जाते हैं। यदि आप और हम पत्रकार नहीं भी होते तो किसी और व्यवसाय में भी यही करते। संभवतः इसलिये ही हमें श्रमजीवि कहा जाता है क्योंकि श्रम ही हमारे जीवन का आधार है। हम सरस्वती के उपासक हैं और हमारी उपासना का माध्यम हमारी कलम है। इस कलम की विन्रमता देखिये कि यदि इसे आप सीधा कर देते हैं तो यह लिखने का उपक्रम रोक देती है किन्तु जैसे ही यह झुकती है, वह नदी के पानी की तरह बहने लगती है। हमारे विचार और कलम की स्याही एक सुंदर अभिव्यक्ति का माध्यम बनते हैं। 

मेरा यह विचार महज एक लेख नहीं है बल्कि एक आग्रह है उस युवा पत्रकार पीढ़ी से जो इस महायज्ञ में षामिल तो हो गये हैं किन्तु उन्हंे अपनी ताकत का अहसास नहीं है। वे हर समय भ्रम की स्थिति में रहते हैं। अच्छा लिखना जानते हैं, अच्छा सोचते हैं और अच्छा करने का जज्बा भी उनमें है किन्तु उन्हें इस बात का इल्म नहीं है  िकवे फकीरी के पेषे में आये हैं। वे लिखेंगे तो समाज और देष में षुचिता का निर्माण होगा और उनके इस लिखे से अखबार का मालिक कदाचित मालामाल बनेगा। षुचिता और माल के बीच हमारी नयी पीढी को तय करना होगा कि वे आखिर उनका रास्ता क्या हो? वे माल की तरफ भागें या समाज में षुचिता के लिये जो जवाबदारी उनके कंधों पर है, उसे पूरा करें। इस बात को लिखने में मुझे परहेज नहीं है कि हममे से अनेक दिग्गज पत्रकार भावी पीढ़ी में कलम का संस्कार उत्पन्न करने के बजाय कमाने की संस्कृति पैदा कर रहे हैं। भावी पत्रकारों को इस गफलत में नहीं पड़ना चाहिए। हमें महान पत्रकार दादा माखनलाल की पत्रकारिता को, गांधीजी की पत्रकारिता को स्मरण में रखकर कलम के संस्कार को आगे बढ़ाना है। झुकने का अर्थ समझौता नहीं है बल्कि यह विनम्रता है और पत्रकारिता विनम्रता की पहली सीढ़ी है। पत्रकारिता के अवधूतों के प्रसंग में जो बातें लिखी हैं, वह मेरी भावना है और मेरा विष्वास है कि कलम के संस्कार की पत्रकारिता हमेषा अपनी आभा बिखरेते रहेगी।

Monday, April 8, 2013

पत्रकारों की शिक्षा नहीं, शिक्षित होना ज्यादा जरूरी



मनोज कुमार
डाक्टर और इंजीनियर की तरह औपचारिक डिग्री अनिवार्य करने के लिये प्रेस कौंसिंल की ओर से एक समिति का गठन कर दिया गया है. समिति तय करेगी कि पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता क्या हो. सवाल यह है कि पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता तय करने के बजाय उन्हें शिक्षित किया जाये क्योंकि प्रशिक्षण के अभाव में ही पत्रकारिता में नकारात्मकता का प्रभाव बढ़ा है. मुझे स्मरण है कि मैं 11वीं कक्षा की परीक्षा देने के बाद ही पत्रकारिता में आ गया था. तब जो मेरी ट्रेनिंग हुई थी, आज उसी का परिणाम है कि कुछ लिखने और कहने का साहस कर पा रहा हूं. साल 81-82 में पत्रकारिता का ऐसा विस्तार नहीं था, जैसा कि आज हम देख रहे हैं. संचार सुविधाओं के विस्तार का वह नया नया दौर था और समय गुजरने के बाद इन तीस सालों में सबकुछ बदल सा गया है. विस्तार का जो स्वरूप आज हम देख रहे हैं, वह कितना जरूरी है और कितना गैर-जरूरी, इस पर चर्चा अलग से की जा सकती है. फिलवक्त तो मुद्दा यह है कि पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता तय करने की जो कवायद शुरू हुई है वह कितना उचित है.
काटजू साहब अनुभवी हैं और उन्हें लगता होगा कि पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता तय करने के बाद पत्रकारिता के स्तर में जो गिरावट आ रही है, उसे रोका जा सकेगा और इसी सोच के साथ उन्होंने डाक्टर और इंजीनियर से इसकी तुलना भी की होगी. याद रखा जाना चाहिये कि एक पत्रकार का कार्य एवं दायित्व डाक्टर, इंजीनियर अथवा वकील के कार्य एवं दायित्व से एकदम अलग होता है. पत्रकारिता के लिये शैक्षिक योग्यता जरूरी नहीं है, यह हम नहीं कहते लेकिन केवल तयशुदा शैक्षिक डिग्री के बंधन से ही पत्रकार योग्य हो जाएंगे, इस पर सहमत नहीं हुआ जा सकता है. पिछले बीस वर्षाे में देशभर में मीडिया स्कूलों की संख्या कई गुना बढ़ गयी है. इन मीडिया स्कूलों की शिक्षा और यहां से शिक्षित होकर निकलने वाले विद्यार्थियों से जब बात की जाती है तो सिवाय निराशा कुछ भी हाथ नहीं लगता है. अधिकतम 25 प्रतिशत विद्यार्थी ही योग्यता को प्राप्त करते हैं और शेष के हाथों में डिग्री होती है अच्छे नम्बरों की. शायद यही कारण है कि पत्रकारिता की उच्च शिक्षा के बावजूद उनके पास नौकरियां नहीं होती है. कुछ दूसरे प्रोफेशन में चले जाते हैं तो कुछ फ्रटेंशन में. यह बात मैं अपने निजी अनुभव से कह रहा हूं क्योंकि मीडिया के विद्यार्थियों से परोक्ष-अपरोक्ष मेरा रिश्ता लगातार बना हुआ है. सवाल यह है कि जब पत्रकारिता की उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद भी योग्यता का अभाव है तो कौन सी ऐसी डिग्री तय की जाएगी जिससे पत्रकारिता में सुयोग्य आकर पत्रकारिता में नकरात्मकता को दूर कर सकें? 
वर्तमान समय की जरूरत डिग्री की नहीं बल्कि व्यवहारिक प्रशिक्षण की है. देशभर में एक जैसा हाल है. वरिष्ठ पत्रकार भी विलाप कर रहे हैं कि पत्रकारिता का स्तर गिर रहा है किन्तु कभी किसी ने अपनी बाद की पीढिय़ों को सिखाने का कोई उपक्रम आरंभ नहीं किया. एक समय मध्यप्रदेश के दो बड़े अखबार नईदुनिया और देशबन्धु पत्रकारिता के स्कूल कहलाते थे. आज ये स्कूल भी लगभग बंद हो चुके हैं क्योंकि नईदुनिया का अधिग्रहण जागरण ने कर लिया है और देशबन्धु में भी वह माहौल नहीं दिखता है. जो अखबार योग्य पत्रकार का निर्माण करते थे, वही नहीं बच रहे हैं अथवा कमजोर हो गये हैं तो किस बात का हम रोना रो रहे हैं? हमारी पहली जरूरत होना चाहिये कि ऐसे संस्थानों को हमेशा सक्रिय बनाये रखने की ताकि पत्रकारिता में योग्यता पर कोई सवाल ही न उठे.
पत्रकारों की योग्यता का सवाल इसलिये भी बेकार है क्योंकि पत्रकारिता हमेशा से जमीनी अनुभव से होता है. किसी भी किस्म का सर्जक माटी से ही पैदा होता है. मुफलिसी में जीने वाला व्यक्ति ही समाज के दर्द को समझ सकता है और बेहतर ढंग से अभिव्यक्त करता है. एक रिपोर्टर अपने अनुभव से किसी भी मुद्दे की तह तक जाता है और साफ कर देता है कि वास्तविक स्थिति क्या है. पत्रकारों की जिंदगी और सेना की जिंदगी में एक बारीक सी रेखा होती है. दोनों ही समाज के लिये लड़ते और जीते हैं. सैनिक सीमा की सरहद पर देश के लिये तैनात रहता है तो पत्रकार सरहद की सीमा के भीतर समाज को बचाने और जगाने में लगा रहता है. किसी दंगे या दुघर्टना के समय एक डाक्टर और इंजीनियर को मैदान में नहीं जाना होता है लेकिन एक पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर समाज तक सूचना पहुंचाने का काम करता है. मेरा यकिन है कि तब शैक्षिक योग्यता कोई मायने नहीं रखती बल्कि समाज के लिये जीने का जज्बा ही पत्रकार को अपने कार्य एवं दायित्व के लिये प्रेरित करता है. एक इंजीनियर के काले कारनामे या एक डाक्टर की लापरवाही और लालच से पर्दा उठाने का काम पत्रकार ही कर सकता है. पत्रकार को इन सब के बदले में मिलता है तो बस समाज का भरोसा. आप स्वयं इस बात को महसूस कर सकते हैं कि समाज का भरोसा इस संसार में यदि किसी पर अधिक है तो वह पत्रकारिता पर ही. वह दौड़ कर, लपक कर अपनी तकलीफ सुनाने चला आता है. पत्रकार उससे यह भी जिरह नहीं करता बल्कि उसकी तकलीफ सुनकर उसे जांचने और परखने के काम में जुट जाता है और जहां तक बन सके, वह पीडि़त को उसका न्याय दिलाने की कोशिश करता है. यही पीडि़त बीमार हो तो डाक्टर से समय लेने, समय लेने के पहले फीस चुकाने में ही उसका समय खराब हो जाता है. क्या इसके बाद भी किसी पत्रकार की शैक्षिक योग्यता तय की जा सकती है.
जहां तक पत्रकारिता में नकरात्मकता का सवाल है तो यह नकारात्मकता कहां नहीं है? समाज का हर सेक्टर दूषित हो चुका है, भले ही प्रतिशत कम हो या ज्यादा. इसलिये अकेले पत्रकारिता पर दोष मढऩा अनुचित होगा. पत्रकारिता में जो नकरात्मकता का भाव आया है, उसे पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता के सहारे दूर करने का अर्थ एक सपना देखने जैसा है क्योंकि यह नकारात्मकता पत्रकारों की नहीं बल्कि संस्थानों की है. संस्थानों को यह सुहाने लगा है कि उनके दूसरे धंधों को बचाने के लिये कोई अखबार, पत्रिका का प्रकाशन आरंभ कर दिया जाये अथवा एकाध टेलीविजन चैनल शुरू कर लिया जाये. यह उनके लिये बड़ा ही सुविधाजनक है. एक तो उनके धंधों की हिफाजत होगी और जो नुकसान मीडिया में दिखेगा, उससे उनकी ब्लेक कमाई को व्हाईट किया जा सकेगा. इसी के साथ वे नौसीखिये अथवा अयोग्य पत्रकारों को नौकरी पर रख लेते हैं. पत्रकारों के नाम पर ऐसे लोगों को रख लिया जाता है जिन्हें अपनी जिम्मेदारी का कोई भान भी नहीं होता है. तिस पर नेता-मंत्री और अधिकारियों द्वारा कुछ पूछ-परख हो जाने के बाद उन्हें लगता है कि इससे अच्छा माध्यम तो कुछ हो ही नहीं सकता. कहने का अर्थ यह है कि इन मीडिया हाऊसों पर प्रतिबंध लगाने अथवा योग्यता के आधार पर पत्रकारों के चयन का कोई आधार तय होना चाहिये, कोई नियम और नीति बनाया जाना चाहिये.
इसी से जुड़ा एक सवाल और मेरे जेहन में आता है. महानगरों का तो मुझे पता नहीं लेकिन ठीक-ठाक शहरों के अखबारों में शैक्षिक एवं बैंकिंग संस्थाओं में अच्छी-खासी तनख्वाह पर काम करने वाले लोग अखबार के दफ्तरों में अंशकालिक पत्रकार के रूप में सेवायें देने लगते हैं. कई बार नाम के लिये तो कई बार नाम के साथ साथ अतिरिक्त कमाई के लिये भी. ऐसे में पूर्णकालिक पत्रकारों को उनका हक मिल नहीं पाता है और कई बार तो नौकरी के अवसर भी उनसे छीन लिया जाता है. प्रबंधन को लगता है कि मामूली खर्च पर जब काम चल रहा है तो अधिक खर्च क्यों किया जाये. इस प्रवृत्ति पर भी रोक लगाया जाना जरूरी लगता है. 
समिति उपरोक्त बातों पर तो गौर करें ही. यह भी जांच लें कि सरकार द्वारा समय समय पर बनाये गये वेजबोर्ड का पालन कितने मीडिया हाऊसों ने किया. हर मीडिया हाऊस कुल स्टाफ के पांच या दस प्रतिशत लोगों को ही पूर्णकालिक बता कर लाभ देता है, शेष को गैर-पत्रकार की श्रेणी में रखकर अतिरिक्त खर्च से बचा लेता है. समिति योग्यता के साथ साथ मीडिया हाऊस के शोषण से पत्रकारों की बचाने की कुछ पहल करे तो प्रयास सार्थक होगा. मीडिया हाऊसों के लिये पत्रकारों का प्रशिक्षण अनिवार्य बनाये तथा इस प्रशिक्षण के लिये प्रेस कौंसिल उनकी मदद करे. हो सके तो राज्यस्तर पर प्रेस कौंसिल प्रशिक्षण समिति गठित कर पत्रकारों के प्रशिक्षण की व्यवस्था करे. पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता तय करने वाली समिति से एक पत्रकार होने के नाते मैंने आग्रहपूर्वक उक्त बातें लिखी हैं. कुछ बिन्दु पर समिति सहमत होकर कार्यवाही करेगी तो मुझे प्रसन्नता होगी. 

Saturday, March 9, 2013

पत्रकारिता से मीडिया तक वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार की नई किताब



-अभिनव तैलंग, कला समीक्षक, भोपाल  

वर्तमान में पत्रकारिता हाशिये पर है और मीडिया शब्द चलन में है. पत्रकारिता के गूढ़ अर्थ और मीडिया की व्यापकता को रेखांकित करता मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार एवं भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका समागम के सम्पादक मनोज कुमार की नई किताब पत्रकारिता से मीडिया तक का प्रकाशन वैभव प्रकाशन रायपुर ने किया है. मनोज कुमार विगत तीन दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. अपने अनुभवों को और समय समय पर लिखे गये लेखों का यह संग्रह महज संकलन न होकर एक दस्तावेज बन पड़ा है. मनोज कुमार की यह पांचवीं किताब है.
पत्रकारिता के विविध विषयों पर ऐसे आलेख हैं जो हमेशा सामयिक बने रहेंगे. किताब में शामिल पहला लेख पत्रकारिता से मीडिया तक में उन्होंने इस बात पर अफसोस जाहिर किया है कि कभी हम अर्थात श्रमजीवी कहलाते थे और आज हम मीडिया कर्मी हो गये हैं. यह एक गंभीर सवाल है जिस पर हम सबको विचार करने की जरूरत है कि हम तो हमेशा से श्रमजीवी रहे हैं और रहेंगे. इसी तरह पत्रकारिता की भाषा, पाठकों की उदासीनता, अखबार के पन्नों पर बढ़ते विज्ञापन, पेडन्यूज, पीत पत्रकारिता आदि आदि विषयों पर उनके तल्ख टिप्पणियों वाले लेख शामिल है. यह किताब कई बार मन को भीतर तक परेशान कर जाती है.
मनोज कुमार की इस किताब में कुछ अन्य आलेख सामाजिक सरोकार के हैं. वह भी समय की नब्ज पर हाथ रखते दिखते हैं. 128 पेज की इस किताब में तीस लेख शामिल किये गये हैं. छपाई खूबसूरत है  और कीमत भी अधिक नहीं महज दो सौ रूपये. वैभव प्रकाशन को इस बात की दाद देनी चाहिये कि इस कठिन समय में वे ऐसी किताब छापने का साहस किया जब इसके खरीददार शायद ना मिले. यह किताब प्रोफेशनल्स के साथ ही पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिये जरूरी किताब है.

Monday, January 14, 2013

महात्मा गांधी हैं चर्चित राष्ट्रपति !



लीना
12 जनवरी के प्रभात खबरपटना में शहर में महात्मा गांधी की प्रमिता अनावरण को लेकर एक खबर छपी। इसकी पहली पंक्ति देखिए- ‘‘26 जनवरी को गांधी मैदान में चर्चित राष्ट्रपति महात्मा गांधी की भव्य प्रतिमा का अनावरण किया जाना है ......’’ इन पंक्तियों में इस तरह से गलत टाइपिंग या छपाई की गुंजाइश भी नजर नहीं आतीजो कि राष्ट्रपिता से चर्चित राष्ट्रपति हो जाए। इस रिपोर्ट में यों तो गलतियां और भी हैंपर अभी बात सिर्फ तथ्यपरक गलतियों की। यह अखबार के खास पेज- प्रभात खबर लाइफ@पटना की उस दिन की प्रमुख खबर थी। अन्य अखबारों में खबरों में भी कई बार गलतियां देखने को मिलती हैं। इन दिनों अक्सर ही अखबार पढ़ते हुए ऐसा देखने को मिलता है। जबकि एक खबरलिखे जाने से लेकर छप जाने तक कई नजरों से होकर गुजरता है। 

गलतियों हो जाती हैं या कई मुद्दों पर जानकारी का अभाव हमें अच्छे अच्छे लोगों में देखने को मिलता हैंलेकिन तथ्य से संबंधित इस तरह की भयंकर गलतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसे हम क्या कह सकते हैं ?संवाददाता की कम जानकारीसंपादक का अनदेखापनपेज इंचार्ज की गैर जिम्मेवारी या फिर यह सभी कुछ?

सच्चाई है कि आज हमें कई खबरें पढ़ने या देखने को मिलती हैंजो तथ्यात्मक या भाषाई तौर पर गलत होते हैं। खासकर जब बात एक पत्रकार की की जाए तो सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हैपत्रकारों का सामान्य ज्ञान कम क्यों होता जा रहा हैकम से कम खुद लिखे जाने वाले खबरों के बारे में उसका सामान्य ज्ञान इतना तो होना चाहिए। आज जब देश भर में जगह-जगह पत्रकारिता की पढ़ाई होने लगी है और पत्रकारिता की डिग्री वालों को ही किसी मीडिया में जगह दी जाती है- ये सवाल और भी प्रासंगिक हैं। स्रोत लेखिका मीडियामोर्चा वेबसाइट की संपादक है। 

Wednesday, September 26, 2012

बापू को जन्मदिन का उपहार


 
-मनोज कुमार
बापू इस बार आपको जन्मदिन में हम चरखा नहीं, वालमार्ट भेंट कर रहे हैं.गरीबी तो खतम नहीं कर पा रहे हैं, इसलिये  गरीबों को  खत्म करने का अचूक नुस्खा हमने इजाद कर लिया है. खुदरा बाजार में हम विदेशी पंूजी निवेश को अनुमति दे दी है. हमें ऐसा लगता है कि समस्या को ही नहीं, जड़ को खत्म कर देना चाहिए और आप जानते हैं कि समस्या गरीबी नहीं बल्कि गरीब है और हमारे इन फैसलों से समस्या की जड़ गरीब ही खत्म हो जाएगी. बुरा मत मानना, बिलकुल भी बुरा मत मानना. आपको तो पता ही होगा कि इस समय हम इक्कसवीं सदी में जी रहे हैं और आप हैं कि बारमबार सन् सैंतालीस की रट लगाये हुए हैं कुटीर उद्योग, कुटीर उद्योग. एक आदमी चरखा लेकर बैठता है तो जाने कितने दिनों में अपने एक धोती का धागा जुटा पाता है. आप का काम तो चल जाता था  लेकिन हम क्या करें. समस्या यह भी नहीं है, समस्या है कि इन धागों से हमारी सूट और टाई नहीं बन पाती है और आपको यह तो मानना ही पड़ेगा कि इक्कसवीं सदी में जी रहे लोगों को धोती नहीं, सूट और टाई चाहिए वह भी फटाफट  . हमने गांव की ताजी
सब्जी खाने की आदत छोड दी है क्योंकि डीप फ्रीजर की सब्जी हम कई दिनों बाद खा सकते हैं. दरअसल आपके विचार हमेशा से ताजा रहे हैं लेकिन हम लोग बासी विचारों को ही आत्मसात करने के आदी हो रहे हैं. बासा खाएंगे तो बासा
सोचेंगे भी. इसमें गलत ही क्या है?
        बापू माफ करना लेकिन आपको आपके जन्मदिन पर बार बार यह बात याद दिलानी होगी कि हम इक्कसवीं सदी में जी रहे हैं. जन्मदिन, वर्षगांठ बहुत घिसेपिटे और पुराने से शब्द हैं, हम तो बर्थडे और एनवरसरी मनाते हैं. अब यहां भी देखिये कि जो आप मितव्ययता की बात करते थे, उसे हम नहीं भूला पाये हैं इसलिये शादी की वर्षगांठ हो या मृत्यु ,  हम मितव्ययता के साथ एक ही शब्द का उपयोग करते है एनवरसरी. आप देख तो रहे होंगे कि हमारी बेटियां कितनी मितव्ययी हो गयी हैं. बहुत कम कपड़े पहनने लगी हैं. अब आप इस बात के लिये हमें दोष तो नहीं दे सकते हैं ना कि हमने आपकी मितव्ययता की सीख को जीवन में नहीं उतारा. सडक़ का नाम महात्मा गांधी रोड रख लिया और मितव्ययता की बात आयी तो इसे एम.जी. रोड कह दिया. यह एम.जी. रोड आपको हर शहर में मिल जाएगा. अभी तो यह शुरूआत है बापू, आगे आगे देखिये हम मितव्ययता के कैसे कैसे नमूने आपको दिखायेंगे.
        अब आप गुस्सा मत होना बापू क्योंकि हमारी सत्ता, सरकार और संस्थायें आपके नाम पर ही तो जिंदा है. आपकी मृत्यु से लेकर अब तक तो हमने आपके नाम की रट लगायी है. कांग्रेस कहती थी कि गांधी हमारे हैं लेकिन अब सब लोग कह रहे हैं कि गांधी हमारे हैं. ये आपके नाम की माया है कि सब लोग एकजुट हो गये हैं. आपकी किताब  हिन्द स्वराज पर बहस हो रही है, बात हो रही है और आपके नाम की सार्थकता ढूंढ़ी जा रही है. ये बात ठीक है कि गांधी को सब लोग मान रहे हैं लेकिन गांधी की बातों को मानने वाला कोई नहीं है लेकिन क्या गांधी को मानना, गांधी को नहीं मानना है. बापू आप समझ ही गये होंगेकि इक्कसवीं सदी के लोग किस तरह और कैसे कैसे सोच रखते हैं. अब आप ही समझायें कि हम ईश्वर, अल्लाह, नानक और मसीह को तो मानते हैं लेकिन उनका कहा कभी माना क्या? मानते तो भला आपके हिन्दुस्तान में जात-पात के नाम पर कोई फसाद हो सकता था. फसाद के बाद इन नामों की माला जप कर पाप काटने की कोशिश जरूर करते हैं.
बापू छोड़ो न इन बातों को, आज आपका जन्मदिन है. कुछ मीठा हो जाये. अब आप कहेंगे कि कबीर की वाणी सुन लो, इससे मीठा तो कुछ है ही नहीं. बापू फिर वही बातें, टेलीविजन के परदे पर चीख-चीख कर हमारे युग नायक अमिताभ कह रहे हैं कि चॉकलेट खाओ, अब तो वो मैगी भी खिलाने लगे हैं. बापू इन्हें थोड़ा समझाओ ना पैसा कमाने के लिये ये सब करना तो ठीक है लेकिन इससे बच्चों की सेहत बिगड़ रही है, उससे तो पैसा न कमाओ. मैं भी भला आपसे ये क्या बातें करने लगा. आपको तो पता ही नहीं होगा कि ये युग नायक कौन है और चॉकलेट मैगी क्या चीज होती है. खैर, बापू हमने शिकायत का एक भी मौका आपके लिये नहीं छोड़ा है. जानते हैं हमने क्या किया, हमने कुछ नहीं किया. सरकार ने कर डाला. अपने रिकार्ड में आपको उन्होंने कभी कहीं राष्ट्रपिता होने की बात से साफ इंकार कर दिया है. आप हमारे राष्ट्रपिता तो हैं नहीं, ये सरकार का रिकार्ड कहता है. बापू बुरा मत, मानना. कागज का क्या है, कागज
पर हमारे बापू की शख्सियत थोड़ी है, बापू तो हमारे दिल में रहते हैं लेकिन सरकार को आप जरूर बहादुर सिपाही कह सकते हैं. बापू माफ करना हम इक्कसवीं सदी के लोग अब चरखा पर नहीं, वालमार्ट पर जिंदा रहेंगे. इस बार आपके बर्थडे पर यह तोहफा आपको अच्छा लगे तो मुझे फोन जरूर करना. न बापू न..फोन नहीं, मोबाइल करना और इंटरनेट की सुविधा हो तो क्या बात है..

Friday, August 3, 2012

हाय रे, हॉकी, यही है तेरी किस्मत


मनोज कुमार
बापू और हॉकी का हाल एक जैसा हो गया है। सूचना के अधिकार के तहत कुछ महीने पहले जानकारी मांगी गयी थी कि किस कानून के तहत महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता की पदवी दी गयी है तो भारत सरकार ने खुलासा किया था कि महात्मा गांधी को इस तरह की कोई पदवी नहीं दी गई है। अब हॉकी को लेकर भारत सरकार के मंत्रालय ने हॉकी को राष्ट्रीय खेल मानने से मना कर दिया है। यह खुलासा भी सूचना के अधिकार के तहत मांगी गयी जानकारी में हुआ है। हॉकी को भारत में किसी खेल की तरह नहीं लिया जाता है बल्कि इस खेल के साथ हमारी अस्मिता को जोड़ कर देखा जाता है। बिलकुल उसी तरह जिस तरह कोई कानून महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता माने या न माने भारत और पूरा संसार उन्हें राष्ट्रपिता कहने में स्वयं गर्व की अनुभूति करता है। स्वाधीनता के छह दषक गुजर जाने के बाद आज जब हमंे यह पता चलता है कि हॉकी को राष्ट्रीय खेल का दर्जा ही नहीं है तो यह हम सबके लिये षर्मनाक है। दुर्भाग्यजनक है कि छह दषक गुजर जाने के बाद भी हम हॉकी को कानूनन राष्ट्रीय खेल घोषित नहीं कर पाये।
खेलों के विकास के लिये राष्ट्रीय स्तर से लेकर राज्य स्तर तक लगातार कोषिषें हो रही हैं। हर साल करोड़ों रुपये स्वाहा किये जा रहे हैं लेकिन हमारा खेल का स्तर सुधर नहीं सका है तो ऐसी जानकारियां इसके बुनियाद में हैं। स्मरण रखा जाना चाहिए कि जिन खेलों को हाषिये पर रखा गया है उनमें एक हॉकी भी है। हॉकी पैसों के लिये नहीं देष के लिये खेला जाता है। यह अलग बहस का मुद्दा हो सकता है कि हॉकी को सम्मान दिलाने के लिये और हॉकी खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाने के लिये केन्द्र सरकार क्या कर रही है अथवा नहीं कर रही है। फिलवक्त तो हॉकी का राष्ट्रीय खेल नहीं होने का यक्ष प्रष्न हमारे सामने है। हॉकी खिलाड़ियों को पर्याप्त खाना नहीं देना, वेतन भत्ते के लाले, खिलाड़ियों के नाम पर अफसरों का जेब गर्म होने की खबरें यदा-कदा आती रही हैं। खेल और खिलाड़ी की चिंता किसी को नहीं रही है। यदि ऐसा होता तो आज हॉकी को राष्ट्रीय खेल होने का गर्व हासिल होता और हम भारतीय गर्व से कहते कि हॉकी हमारी षान है। बदकिस्मती से हमारा सिर षर्म से झुक गया है।
मध्यप्रदेष इस बात के लिये षाबासी का हकदार है कि उसने हॉकी को उसका सम्मान दिलाने और खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिये हरसंभव प्रयास किया है। अभी हो रहे ओलंपिक खेलों में हॉकी में मध्यप्रदेष का षिवेन्द्र इस बात का उदाहरण है। मध्यप्रदेष सरकार हॉकी के बेहतरी के लिये जो उपक्रम कर रही है, उसकी न केवल देषव्यापी सराहना हुई है बल्कि हॉकी खिलाड़ियों को इस बात का संतोष है कि कोई सरकार तो है जो हॉकी को बचाने में जुटी हुई है। भोपाल कभी हॉकी की नर्सरी कहलाता था। विष्वमंच पर भोपाल से जितने बेहतरीन हॉकी खिलाड़ी मध्यप्रदेष ने दिये, वह हॉकी के इतिहास का स्वर्णिम पन्ना है। एक बार फिर हॉॅकी के मैदान में मध्यप्रदेष की दुदुंभी बजे, इस बात का प्रयास राज्य सरकार कर रही है। एस्टो टर्फ का बिछना और हरसंभव मदद के लिये आगे आना, इस बात का संकेत है।
बहरहाल, भारत सरकार ने हॉकी को राष्ट्रीय खेल मानने से इंकार किया है, उसे महज एक सवाल का जवाब मानकर नहीं टाला जा सकता बल्कि इसके लिये उन तथ्यांे और तर्कों की खोज करना होगी कि आखिर हॉकी को अब तक राष्ट्रीय खेल का दर्जा क्यों नहीं दिया जा सका है। हॉकी को राष्ट्रीय खेल का दर्जा दिलाने के लिये देषव्यापी अभियान चलाने की जरूरत होगी और भारत सरकार पर दबाव बनाना होगा। हॉकी अब तक काननून भले ही राष्ट्रीय खेल नहीं बन सका हो किन्तु हॉकी हर भारतीय के लिये राष्ट्रीय खेल का ही महत्व रखता है।

Thursday, July 19, 2012

बिटिया अब नहीं जाती है पीह

मनोज कुमार
अभी अभी मेरी पत्नी अपने मोबाइल फोन से फारिंग हुई है. बीस मिनट से ज्यादा हो गये होंगे बतियाते हुए. पूछने पर पता चला कि अपनी मम्मी से बातें कर रही थी. क्या खाया, क्या पकाया, कौन आया और कौन गया से लेकर वो सारी बातें जो महीनों बाद पीहर पहुंच कर कभी बिटिया अपनी अम्मां से करती थी, अब हर दिन बल्कि हर पहर हो रही है. कोसों का फासला खत्म सा हो गया है. जब मन किया, मोबाइल का बटन दबाया और सेकंड में बातों का सिलसिला शुरू. न आने जाने की परेशानी और न साज समान की. अब बीवियां पीहर जाने का नाम नहीं लेती हैं. उनका पीहर तो मोबाइल हो गया है. कभी पीहर जाने के लिये उतावली रहने वाली बीवियां अब नहीं जाने का बहाना ढूंढ़ती हैं. पतिदेव जिद करें कि कुछ दिनों के लिये पीहर हो आओ तो वे उन पर उलटे अहसान मढ़ते हुए कहेंगी आपके और बच्चों का रूटीन डिस्टर्ब हो जाता है, इसलिये वे नहीं जाना चाहतीं.
मोबाइल ने सुविधा तो दी है लेकिन कई चीजें खत्म भी कर दी है. किसी ब्याहता का पीहर जाना, केवल पीहर जाना नहीं होता था बल्कि इसके पीछे एक सामाजिक ताना-बाना होता था. पति-पत्नी के बीच की एकरसता को खत्म करने का यह एक अवसर होता था. रिश्तों की गर्माहट को महसूस करने का अवसर मिलता था. परिवार में ताजगी का अहसास होता था. इनके जाने और उनके नहीं रहने के बीच का फर्क महसूस होता था, यह फर्क अब नहीं रहा. एक मोबाइल ने जिंदगी की ताजगी को छीन लिया है. जब मोबाइल नहीं था तो बीवी के पास पीहर जाने का उत्साह होता था. उसे यह जान लेने की उत्सुकता होती थी कि उसकी गैरहाजिरी में अम्मां ने क्या क्या खरीदा है? ब्याहने के बाद अम्मां की मोहब्बत कम तो नहीं हुई, यह जांचने की कोशिश भी अनजाने में बिटिया करती थी. कदाचित अम्मां ने अपनी बहू के लिये बिटिया से कुछ अधिक खरीद लिया तो बिटिया तुनक कर कहती- हां, अब तो मैं परायी हो गयी हूं, अपनी बहू के लिये सब करेगी. बिटिया की इस मासूम शिकायत पर अम्मां न्यौछावर हो जाती. उसे मनाती और बताती कि ऐसा नहीं है.
रूठने और मनाने की इस गर्माहट को भी मोबाइल ने छीन लिया है. पीहर जाकर बिटिया अपने बचपन की यादों को टटोलती, संगी-सहेलियों के बारे में पूछती लेकिन अब मोबाइल इनका पता तो नहीं देगा? पीहर से लौटती बिटिया के आंखों में लरजते आंसू अम्मां को भी रूला जाते थे यह आंसू तब तक थमे रहते जब तक कि बिटिया वापस लौट आने की बात नहीं कहती. पीहर से ससुराल के रास्ते भी बहू के लौट जाने की प्रतीक्षा करते रहते. पतिदेव को अपनी पत्नी के लौट आने का बेसब्री से इंतजार रहता. जिस पत्नी से वह तंग आ चुका होता है, उसके नहीं रहने पर उसे तनहाई डसने लगती है. पत्नी के लौट आने पर पति थोड़ा नाराज दिखता है और पत्नी मनुहार करने बैठ जाती है. अपने घर के बिखर जाने का गम भी उसे रहता था. बात बात में पति और बच्चों को ताना कि उसके नहीं रहने पर घर की क्या हालत बना दी है.
रूठने, मनाने, शिकायत और प्रार्थना अब बीती जमाने की बातें रह गयी है क्योंकि बिटिया अब नहीं जाती है पीहर. महीनों बाद पीहर जाकर मां की खरीदी चीजें, बचपन की यादें और आने जाने वाले का ब्यौरा सुनने और सुनाने का काम भी इस मोबाइल ने खत्म कर दिया है. रोज मां से खबर मिल जाती है. क्या लिया और कितने में लिया, कौन आया, कौन गया और इधर से भी मां को रिपोर्ट हो जाती है कि आज सब्जी में क्या बना और कल की क्या प्लानिंग है. ब्याह के शुरूआती दिनों में पीहर छूट जाने का दुख होता है लेकिन समय गुजर जाने के बाद पति का घर प्यारा लगने लगता है. जो थोड़ी कसर इस मोबाइल से रह गयी थी, वह कसर इंटरनेट ने पूरी कर दी. कैमरे लगाया और पूरा पीहर अपने घर में बैठे घूूम लिया, देख लिया. मां की सूरत भी देख ली और पीहर की दीवारों का रंग भी जान लिया. बिटिया अब नहीं जाती है पीहर.

Sunday, May 20, 2012

आरक्षण की राजनीति का शिकार मत बनाओ

-मनोज कुमार
भोपाल इन दिनों सिनेमा से सम्मोहित है। सिनेमा एक ऐसा सम्मोहन है जिससे बंधा हुआ हर कोई चला आता है। भोपाल को फिल्मसिटी बनाने की बात राजनीतिक गलियारे में दो दशक से ज्यादा समय से चल रही है किन्तु अब तक बातें ही बातें होती रही। राज्य के संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा के प्रयासों से बात अब निकल कर कागज पर आ गयी है और ज्यादा देर नहीं हुई तो हकीकत में फिल्म सिटी अस्तित्व में आ जाएगी। हाल फिलहाल फिल्म सिटी का मामला संस्कृति विभाग के जिम्मे है। फिल्मसिटी का बन जाना भोपाल के लिये अच्छा ही होगा। हुनरमंद लोगों से भोपाल बल्कि समूचा मध्यप्रदेश गौरवान्वित होता रहा है। फिल्मसिटी बन जाने से हुनरमंदों को काम भी मिलेगा और सम्मान भी। हालांकि यह सब बातें फिलवक्त कल्पना की है। फिलवक्त कल्पना की बातें इसलिये कि फिल्म अभी थियेटर पर चढ़ी नहीं है और टिकट की ब्लेक शुरू हो गई है। जी हां, जिन दो फिल्मों को देखकर हम शान से कहते हैं देखो वो मेरा भोपाल, उसी फिल्म के चंद सेकंड के दृश्य में लगभग एक्स्ट्रा की भूमिका में हमारे अपने मंजे हुए कलाकारों को देखकर भविष्य का अंदाजा हो जाता है। जिन कलाकारों को दबंग भूमिका में होना था उन्हें सपनों के सौदागरों ने लगभग एक्स्ट्रा की भूमिका में खड़ा कर दिया है। एक्स्ट्रा शब्द थोड़ा तल्ख है किन्तु सच भी यही है। मैं बात कर रहा हूं जनाब प्रकाश झा साहब की उन दो फिल्मों की जिन्हें देशभर में ख्याति मिली जिसमें पहली फिल्म राजनीति और दूसरी विवादों मंें घिरी फिल्म आरक्षण की।
दोनों ही फिल्मों का जादू भोपाल के वाशिंदों के सिर चढ़कर बोला। इस जादू से आम आदमी तो अभिभूत था ही बल्कि वे लोग भी अभिभूत थे जिन्हें फिल्म में एक्स्ट्रा की तरह भूमिका मिली। जिन छोटी और लगभग गुमनाम सी भूमिका निभाकर भोपाल के आले दर्जे के कलाकारों ने फिल्म में अपनी मौजूदगी का जो संतोष पाया, उसका सुख वही बता सकते हैं किन्तु मैं व्यक्तिगत तौर पर नहीं समझता कि जिस आलोक चटर्जी को एनएसडी में बेहतरीन अभिनय के लिये गोल्ड मेडल मिला हो, उन्हें गुमनाम सी भूमिका में होना चाहिए। आलोक जैसे पहले पंक्ति के अभिनेता को नामालूम सी भूमिका के लिये प्रकाश झा ने किन शर्तों पर तैयार किया, यह भी मैं नहीं जानता किन्तु यह जरूर जानता हूं कि प्रकाश झा ने एक आले दर्जे के कलाकार को नेपथ्य में खड़ा कर दिया। आलोक ही क्यों, बच्चों के चच्चा, मशहूर नाट्य निर्देशक और बेहतरीन कलाकार केजी त्रिवेदी भी आरक्षण में हाशिये पर खड़े दिखायी दिये। कुछ ऐसा ही हाल भोपाल के दूसरे आले दर्जे के कलाकारों के साथ हुआ है। पहले राजनीति में और इसके बाद आरक्षण में।
यह तथ्य को भी याद रखना चाहिए कि प्रकाश झा और दूसरे सिनेमाई दिग्गज २०११ में फिल्म बनाने आ रहे हैं लेकिन रजतपट पर मध्यप्रदेश का दखल बीते कई दशकों से रहा है। लता मंगेशकर से लेकर किशोर कुमार और जया भादुड़ी से लेकर जॉनी वाकर रजत पट के सितारे हैं तो मध्यप्रदेश को इन पर गर्व है। ये तो महज बानगी है, फेहरिस्त तो इतनी लम्बी है कि नाम गिनाते गिनाते ही सूची लम्बी बन जाए। इन सभी लोगों ने रजत पट पर अपनी छाप छोड़ी है। अविभाजित मध्यप्रदेश और विभाजन के बाद बने छत्तीसगढ़ राज्य के प्रतिभा सम्पन्न कलाकारों ने रजतपट पर अपनी जगह बनायी है। बहुत समय नहीं गुजरा जब पीपली लाइव ने पूरे देश का ध्यान खींचा तो मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कलाकारों के कारण। हमारे कलाकार केनवास में गढ़े नहीं गये हैं बल्कि उनका रिश्ता जमीन से है और एक जमीन का कलाकार जब मंच पर आता है या पर्दे पर तो वह अपनी अदायगी से सबको मोह लेता है। इन सभी लोगों को रजतपट पर सम्मानजनक स्थान मिला क्योंकि ये लोग मुंबई में चुनौतियों से जूझते हुए अपनी जगह बनायी।
मध्यप्रदेश को हिन्दुस्तान का दिल कहा जाता है और इस प्रदेश का निर्माण देश के विभिन्न भूभागों को मिलाकर हुआ है। एक बड़े हिन्दी प्रदेश का गौरव प्राप्त इस प्रदेश की तकनीकी कठिनाई यह है कि यह अलग अलग बोली और भाषाओं का प्रदेश है और यहां बनने वाली हर फिल्म का स्वरूप प्रादेशिक न होकर आंचलिक होता है। मसलन बुंदेलखंडी, मालवी आदि इत्यादि। मध्यप्रदेश को प्रतिबिम्बित करने वाली फिल्म का निर्माण में बाधा है जबकि राजस्थान, बिहार, यूपी और अभी हाल में बने छत्तीसगढ़ भी इस तकनीकी दिक्कत से मुक्त है। यदि यह दिक्कत नही होती तो मध्यप्रदेश अन्य प्रदेशांे की तरह फिल्म निर्माण में झंडे गाड़ रहा होता।
बहरहाल, बात साफ है कि ये सिनेमा बनाने वाले भोपाल पर फिदा होकर नहीं आ रहे हैं बल्कि पूरा हिसाब-किताब लगाकर आ रहे हैं। कास्ट कटिंग के इस दौर में भोपाल में फिल्म बनाना न केवल इनके लिये सस्ता सौदा है बल्कि रजतपट पर अपना चेहरा दिखाने की ख्वाहिश लिये जवान, प्रतिभावान कलाकार और तकनीकीशियन मुफ्त में अथवा मुफ्त के भाव मिल जाते हैं। अस्पताल, होटल, गाड़ी, मजदूर और लगभग इसी मुफ्त के भाव में स्थानीय अखबारों और पत्रिकाओं में पब्लिसिटी। यह बात तो तय है कि इतनी सुविधाएं इन सौदागरों को मुंबई में मयस्सर नहीं है और ऐसे में मध्यप्रदेश के दिल में फिल्मसिटी बनाये जाने का ख्वाब जग जाए तो सपनों के इन सौदागरों के तो पौबारह हो रहे हैं। भोपाल में फिल्मसिटी अभी प्रोसेस में है किन्तु पहली पंक्ति के कलाकारों को एक्स्ट्रा जैसी भूमिका में रखने की शुरूआत हो गई है। यह रस्मी शुरूआत नहीं है बल्कि यह एक परम्परा की नींव डालने की शुरूआत है। सवाल गंभीर है और इस पर अभी से बहस-मुबाहिसा होना चाहिए। जिन कलाकारों के अभिनय को देखकर हम मंत्रमुग्ध हो जाते हैं, उन्हें इस तरह अभिनय करते देख मन रो उठता है। सिनेमाई सौदागरों की यह राजनीति और फिल्म में आरक्षण की इस परम्परा का यहीं अंत होना चाहिए।
याद कर लीजिए इसी षहर का एक आदमी इन्हीं सौदागरों से मुंहमांगी कीमत वसूलता है और उन्हें देना पड़ता है। इस शख्स का नाम है जयंत देशमुख। जयंत भारत भवन से चमकने वाला एक तारा है जिसने खुद को साबित करने के लिये मुंबई की ट्रेन पकड़ ली। रायपुर से भोपाल और भोपाल से मुंबई के बीच का सफर जयंत के लिये आसान नहीं रहा होगा। चुनौतियों से जूझते जयंत के पास प्रतिभा थी और स्वयं पर विश्वास। आखिरकार उसने जगह बना ली। संभव है कि जयंत को अब इन लोगों से नहीं बल्कि इन लोगों को जयंत से समय लेने के लिये टेलीफोन करना पड़ता होगा। राजीव वर्मा भी इसी शहर से हैं। आला दर्जे के अभिनेता हैं और भोपाल रंगमंच में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। भले ही वे अभिताभ बच्चन के नातेदार हांे लेकिन मुंबई में अपने लिये स्पेस बनाने में उन्हें भी संघर्ष करना पड़ा होगा। उन्होंने किसी भी फिल्म अथवा टेलीविजन सीरियल में गुमनाम किरदार की भूमिका नहीं निभायी। टीवी सीरियल चुनौती से अपना अभिनय शुरू करने वाले राजीव वर्मा ने राजश्री की फिल्मों में सम्मानजनक भूमिका निभायी है। उनका यह सिलसिला अब तक जारी है और बना रहेगा।
जयंत देशमुख एवं राजीव वर्मा की मिसाल इसलिये दी जा रही है कि रजतपट पर अपनी जगह बनाने के लिये चुनौतियों का सामना इन्हें करना पड़ा था और जो लोग इस सम्मोहनी दुनिया मंे आना चाहते हैं उन्हें भी इन चुनौतियों का सामना करना होगा। सिनेमा का सम्मोहन आपको खींचता है तो आपको संघर्ष के लिये स्वयं को तैयार करना होगा। इन सौदागरों को बताना होगा कि जिन्हें आप मुंबई से ढोकर लाते हैं, जिन्हें आप प्रतिभावान कहते हैं, हमारी प्रतिभा उन्हें कम नहीं है। एक बार हम पर दांव तो खेलकर देखिये जनाब। यह सब आसान नहीं है किन्तु शुरूआत तो करनी ही होगा। हमें अपनी कीमत खुद आंकनी होगी। हम तय करेंगे अपना मोल। फिल्म मुंबई मंे बने या भोपाल में, हम कलाकार फिल्म में आएंगे तो छा जाने के लिये। कुछ पल में गुम हो जाने के लिये नहीं। भीड़ में खो जाने के लिये नहीं। जिस तरह के अभिनय की जगह रंगमंच के हमारे पहले पंक्ति के कलाकारों को दी जा रही है, उसे न करना ही बेहतर होगा। ना करना भी हमारे इन उम्दा कलाकारों को सीखना होगा।