https://samagam.co.in/samagam-may-2026/
Saturday, May 16, 2026
Tuesday, February 17, 2026
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दूरदर्शन भोपाल के बहुचर्चित प्रोग्राम नमस्कार mp में संवाद, संचार और संस्कृति पर सार्थक चर्चा हुई। साथी पूर्वा, पूजा जी और टीम का धन्यवाद।
Thursday, July 17, 2025
मोबाइल से चटका पीहर का मोह
प्रो. मनोज कुमार
अभी अभी मेरी पत्नी अपने मोबाइल फोन से फारिग हुई है. बीस मिनट से ज्यादा हो गये होंगे बतियाते हुए. पूछने पर पता चला कि अपनी मम्मी से बातें कर रही थी. क्या खाया, क्या पकाया, कौन आया और कौन गया से लेकर वो सारी बातें जो महीनों बाद पीहर पहुंच कर कभी बिटिया अपनी अम्मां से करती थी, अब हर दिन बल्कि हर पहर हो रही है. कोसों का फासला खत्म सा हो गया है. जब मन किया, मोबाइल का बटन दबाया और सेकंड में बातों का सिलसिला शुरू. न आने जाने की परेशानी और न साज समान की. अब बीवियां पीहर जाने का नाम नहीं लेती हैं. उनका पीहर तो मोबाइल हो गया है. कभी पीहर जाने के लिये उतावली रहने वाली बीवियां अब नहीं जाने का बहाना ढूंढ़ती हैं. पतिदेव जिद करें कि कुछ दिनों के लिये पीहर हो आओ तो वे उन पर उलटे अहसान मढ़ते हुए कहेंगी आपके और बच्चों का रूटीन डिस्टर्ब हो जाता है, इसलिये वे नहीं जाना चाहतीं.
मोबाइल ने सुविधा तो दी है लेकिन कई चीजें खत्म भी कर दी है. किसी ब्याहता का पीहर जाना, केवल पीहर जाना नहीं होता था बल्कि इसके पीछे एक सामाजिक ताना-बाना होता था. पति-पत्नी के बीच की एकरसता को खत्म करने का यह एक अवसर होता था. रिश्तों की गर्माहट को महसूस करने का अवसर मिलता था. परिवार में ताजगी का अहसास होता था. इनके जाने और उनके नहीं रहने के बीच का फर्क महसूस होता था, यह फर्क अब नहीं रहा. एक मोबाइल ने जिंदगी की ताजगी को छीन लिया है. जब मोबाइल नहीं था तो बीवी के पास पीहर जाने का उत्साह होता था. उसे यह जान लेने की उत्सुकता होती थी कि उसकी गैरहाजिरी में अम्मां ने क्या क्या खरीदा है? ब्याहने के बाद अम्मां की मोहब्बत कम तो नहीं हुई, यह जांचने की कोशिश भी अनजाने में बिटिया करती थी. कदाचित अम्मां ने अपनी बहू के लिये बिटिया से कुछ अधिक खरीद लिया तो बिटिया तुनक कर कहती- हां, अब तो मैं परायी हो गयी हूं, अपनी बहू के लिये सब करेगी. बिटिया की इस मासूम शिकायत पर अम्मां न्यौछावर हो जाती. उसे मनाती और बताती कि ऐसा नहीं है.
रूठने और मनाने की इस गर्माहट को भी मोबाइल ने छीन लिया है. पीहर जाकर बिटिया अपने बचपन की यादों को टटोलती, संगी-सहेलियों के बारे में पूछती लेकिन अब मोबाइल इनका पता तो नहीं देगा? पीहर से लौटती बिटिया के आंखों में लरजते आंसू अम्मां को भी रूला जाते थे यह आंसू तब तक थमे रहते जब तक कि बिटिया वापस लौट आने की बात नहीं कहती. पीहर से ससुराल के रास्ते भी बहू के लौट जाने की प्रतीक्षा करते रहते. पतिदेव को अपनी पत्नी के लौट आने का बेसब्री से इंतजार रहता. जिस पत्नी से वह तंग आ चुका होता है, उसके नहीं रहने पर उसे तनहाई डसने लगती है. पत्नी के लौट आने पर पति थोड़ा नाराज दिखता है और पत्नी मनुहार करने बैठ जाती है. अपने घर के बिखर जाने का गम भी उसे रहता था. बात बात में पति और बच्चों को ताना कि उसके नहीं रहने पर घर की क्या हालत बना दी है.
रूठने, मनाने, शिकायत और प्रार्थना अब बीती जमाने की बातें रह गयी है क्योंकि बिटिया अब नहीं जाती है पीहर. महीनों बाद पीहर जाकर मां की खरीदी चीजें, बचपन की यादें और आने जाने वाले का ब्यौरा सुनने और सुनाने का काम भी इस मोबाइल ने खत्म कर दिया है. रोज मां से खबर मिल जाती है. क्या लिया और कितने में लिया, कौन आया, कौन गया और इधर से भी मां को रिपोर्ट हो जाती है कि आज सब्जी में क्या बना और कल की क्या प्लानिंग है. ब्याह के शुरूआती दिनों में पीहर छूट जाने का दुख होता है लेकिन समय गुजर जाने के बाद पति का घर प्यारा लगने लगता है. जो थोड़ी कसर इस मोबाइल से रह गयी थी, वह कसर इंटरनेट ने पूरी कर दी. कैमरे लगाया और पूरा पीहर अपने घर में बैठे घूूम लिया, देख लिया. मां की सूरत भी देख ली और पीहर की दीवारों का रंग भी जान लिया. बिटिया अब नहीं जाती है पीहर.
Thursday, July 3, 2025
Sunday, November 14, 2021
जनजातीय गौरव दिवस 15 नवम्बर के लिए विशेष
बिरसा मुंंडा के सपनों को सच करता मध्यप्रदेश
मनोज कुमार
मध्यप्रदेश के इतिहास में एक और दिन 15 नवम्बर ऐतिहासिक दिन के रूप में लिखा जाएगा जब जनजातीय गौरव दिवस के रूप में बिरसा मुंडा की जयंती का जयघोष होगा। ह्दयप्रदेश मध्यप्रदेश हमेशा से बड़े दिल का रहा है और रांची के इस महान वीर सपूत बिरसा की जयंती मध्यप्रदेश की भूमि पर आयोजित है। यह एक महज आयोजन नहीं है बल्कि इस बात का संदेश है कि स्वाधीनता संग्राम के लिए सर्वस्व त्याग करने वाले वीर योद्धा किसी क्षेत्र विशेष के ना होकर सम्पूर्ण भारत वर्ष का गौरव हैं। मध्यप्रदेश एक नजीर बन रहा है कि एक राष्ट्र की संकल्पना को कैसे व्यवहार में लाया जाए। यह अवसर भी माकूल है जब हम स्वाधीनता संग्राम के 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं तब इन वीर योद्धाओं का स्मरण समाज का दायित्व बनता है। इन वीरों के स्मरण से उनके कार्यों और बलिदान की जो राष्ट्रीय भावना थी, उससे युवा पीढ़ी को अवगत कराना है। यह मध्यप्रदेश के लिए गौरव की बात है कि बिरसा मुंंंडा की जयंती मनाने का अवसर हमें मिल रहा है।
भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अंग्रेजों को चने चबाने वाले वीर नायकों से मध्यप्रदेश का स्वर्णिम इतिहास लिखा गया है। जिन जनजातीय वीर योद्धाओं का हम स्मरण करते हैं उनमें भीमा नायक, टंट्या मामा, खाज्या नायक, संग्राम शाह, शंकर शाह, रघुनाथ शाह, रानी दुर्गावती, बादल भोई, राजा भभूत सिंह, रघुनाथ मंडलोई भिलाला, राजा ढिल्लन शाह गोंड, राजा गंगाधर गोंड, सरदार विष्णुसिंह उइके जैसे अनेक चिंहित नाम हैं। लेकिन सत्य यह भी है कि अनेक ऐसे नाम हैं जिनका उल्लेख कभी इतिहास में नहीं किया गया। स्वाधीनता संग्राम के 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान पर इतिहास का पुर्नलेखन किया जा रहा है। अब तक जो इतिहास लिखा गया, उसमें स्वतंत्रता संग्राम के अनेक बहुमूल्य घटनाओंं और नामों को जानबूझकर विलोपित कर दिया गया। इतिहास लेखन की इस नवीन प्रकल्प को प्रभावी बनाने के लिए जनजातीय समाज के वीर योद्धाओं का स्मरण करना आवश्यक हो जाता है। यह वही अवसर है जब दबा दिये गए, छिपा दिए गए तथ्य सामने आते हैं और हम इतिहास को नए सिरे से लिखते हैं।
मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह सरकार ने जनजातीय समाज के लिए ऐसे अनेक कार्य किये हैं जो उन्हें मुख्यधारा में लाते हैं। पूर्ववर्ती सरकारों ने सुनियोजित ढंग से जनजातीय समाज को कभी मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बनने दिया। उन्हें इस बात का भय था कि जनजातीय समाज शिक्षित हो जाएगा, आत्मनिर्भर हो जाएगा तो उसके भीतर अपने अधिकारों के लिए लडऩे की शक्ति आ जाएगी। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान इस बात को बेहतर ढंग से जानते थे लेकिन उन्हें अपनी सरकार की नीतियों पर भरोसा है और उनका मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबको बराबर का अधिकार मिलना चाहिए। इस दृष्टि के साथ जनजातीय समाज के लिए ना केवल शिक्षा की व्यवस्था की बल्कि उनके लिए रोजगार के बेहतर अवसर मुहय्या कराया। जिन जनजातीय बच्चों को स्कूल जाना नसीब नहीं था, वे बच्चे आज विदेश में पढ़ रहे हैं। प्राथमिक शिक्षा जिनके लिए कभी नहीं थी और थी भी तो बेहद औपचारिक वे बच्चे इंजीनियरिंग और मेडिकल के साथ एमबीए जैसे विषयों में दक्षता हासिल कर अपनी नई दुनिया गढ़ रहे हैं। जनजाति समाज पर प्रकृति का आशीर्वाद है। प्रकृति से सीधे जुड़े होने के कारण उनके भीतर नैसर्गिक कला संसार बसा हुआ है। शिवराजसिंह सरकार ने इसे पहचाना और देश-दुनिया का मंच दिया जहां आज ना वे अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं बल्कि आय का उत्तम स्रोत भी उन्हें मिल गया है।
वीर योद्धा बिरसा मुंडा की कहानी पढ़ते हैं तो ज्ञात होता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व भी जनजाति समाज सूदखोरों के चंगुल में फंसा था। आज भी हालात में बहुत कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया है। सात दशक की यात्रा का विवेचन करें तो स्पष्ट हो जाता है कि मध्यप्रदेश की जनजाति समुदाय को सूदखोरों से मुक्त करने के लिए कोई गंभीर और प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह सरकार ने इस दिशा में प्रभावी पहल की है। मध्यप्रदेश सरकार का क्रांतिकारी फैसला साहूकारों से जनजाति समुदाय को मुक्त कराना है तथा ऋणमुक्त कर उन्हें अनावश्यक तनाव से मुक्ति दिलाना भी सरकार की प्राथमिकता में है। मध्यप्रदेश अनुसूचित जनजाति साहूकार विनियम 1972 को और अधिक प्रभावी बनाकर साहूकारों के लिए लायसेंस लेना अनिवार्य करने के साथ ब्याज की राशि निर्धारित की जा चुकी है और निर्धारित ब्याज राशि से अधिक लेने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही की जाएगी।
पूर्ववर्ती सरकारों ने जनजातीय समाज को आगे आने नहीं दिया। उनकी कला-कौशल को समाज के समक्ष नहीं रखा जिसकी वजह से हमेशा से आत्मनिर्भर रहा जनजातीय समुदाय स्वयं को निरीह महसूस करने लगा था। बीते डेढ़ दशक में मध्यप्रदेश सरकार ने इस समाज के दर्द को समझा और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई नए प्रकल्प तैयार किये। मोदी सरकार के साथ कदमताल करती मध्यप्रदेश सरकार ने लोकल से वोकल और एक जिला, एक प्रोडक्ट पर कार्य कर इन जनजातियों को आगे बढऩे का अवसर दिया। मध्यप्रदेश के जनजाति समूह खेती करने के साथ वनोपज संग्रह, पशुपालन, मत्स्य पालन, हस्त कला यथा बांस शिल्प, काष्ठ शिल्प, मृदा शिल्प एवं धातु शिल्प का कार्य करते हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने ऐलान किया है कि देवारण्य योजना के अंतर्गत वनोत्पाद और वन औषधि को बढ़ावा दिया जाएगा एवं वन उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य में खरीदा जाएगा। जनजातीय समुदाय की कला कौशल को मध्यप्रदेश सरकार ने ना केवल दुनिया को बताया बल्कि बाजार भी उपलब्ध कराया ताकि उनके उत्पाद का उचित मूल्य मिल सके।
मध्यप्रदेश में जनजातीय समाज की बेहतरी के लिए जो कार्य किये जा रहे हैं, वह बिरसा मुंडा के स्वप्र को सच करने की कोशिश है। योद्धा बिरसा मुंडा भी जनजाति समाज को शोषणमुक्त देखना चाहते थे। वे चाहते थे कि समाज में समरसता हो और जनजाति समाज को मुख्यधारा में स्थान मिले। रोटी और रोजगार के साथ शिक्षा का बेहतर विकल्प मिले। युवा शिक्षित और आत्मनिर्भर हों और उनके मन में देशप्रेम का भाव हो। मध्यप्रदेश बिरसा मुंडा के सपनों को सच कर रहा है क्योंकि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान सबका साथ, सबका विकास के साथ हमारा मध्यप्रदेश गढ़ रहे हैं। बिरसा मुंडा की जयंती के माध्यम से मध्यप्रदेश में जनजातीय समाज की बेहतरी के लिए किये जा रहे कार्यों से पूरा देश परिचित हो सकेगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं)
Monday, May 3, 2021
बेमानी है प्रेस फ्रीडम की बातें
मनोज कुमार
तीन दशक पहले संयुक्त राष्ट्र संघ ने 3 मई को विश्व प्रेस फ्रीडम डे मनाने का ऐलान किया था. तब से लेकर आज तक हम इसे पत्थर की लकीर मानकर चल रहे हैं. इन तीन दशकों में क्या कुछ हुआ, इसकी मीमांसा हमने नहीं की. पूरी दुनिया में पत्रकार बेहाल हैं और प्रेस बंधक होता चला जा रहा है. खासतौर पर जब भारत की चर्चा करते हैं तो प्रेस फ्रीडम डे बेमानी और बेकार का ढकोसला लगता है. दशकवार जब भारत में पत्रकारिता पर नजर डालें तो स्थिति खराब नहीं बल्कि डरावना लगता है. लेकिन सलाम कीजिए हम पत्रकारों की साहस का कि इतनी बुरी स्थिति के बाद भी हम डटे हुए हैं. हम पत्रकार से मीडिया में नहीं बदल पाये इसलिए हमारे साहस को चुनौती तो मिल रही है लेकिन हमें खत्म करने की साजिश हमेशा से विफल होती रही है. इस एक दिन के उत्सवी आयोजन से केवल हम संतोष कर सकते हैं लेकिन फ्रीडम तो कब का खत्म हो चुका है बस समाज की पीड़ा खत्म करने का जज्बा ही हमें जिंदा रखे हुए है.
भारत में पत्रकारिता के पतन की शुरूआत और उसकी स्वतंत्रता खत्म करने का सिलसिला साल 1975 में ही शुरू हो गया था. आपातकाल के दरम्यान जो कुछ घटा और जो कुछ हुआ, वह कई बार बताया जा चुका है. उसे दोहराने का अर्थ समय और स्पेस खराब करना है. लेकिन एक सच यह है कि पत्रकारिता इसके बाद से दो हिस्सों में बंटती चली गई. लोगों ने मिशन से बाहर आकर इसे प्रोफेशन मान लिया. अखबारों और पत्रिकाओं की संख्या मे इजाफा होना शुरू हो गया. कल तक जिनके लिए किसी स्कूल में शिक्षक बन जाना आसान था, उन्हें यह भी आसान लगा कि पत्रकार बन जाओ. ना शिक्षा की पूछ-परख और ना ही अनुभव का कोई लेखा-जोखा. मैं कुछ ऐसे पत्रकारों को जानता हंू जो शीर्ष संस्थाओं के प्रमुख हैं लेकिन जमीनी पत्रकारिता से उनका कोई वास्ता नहीं रहा. डिग्री हासिल की और सुविधाजनक ढंग से बड़े पदों पर आसीन हो गए. नयी पीढ़ी उन्हें प्रखर पत्रकार और आचार्य संबोधित करने लगे. मिश्री घुली बातों से वे चहेते बन गए और आज जिस बात का हम रोना रो रहे हैं, वह इन्हीं महानुभावों की वजह से उत्पन्न हुआ है. इसमें तथाकथित प्रखर पत्रकार और आचार्य बन चुके रसमलाई में लिपटे लोगों की गलती तो थोड़ी है. इससे बड़ी गलती उन दिग्गज लोगों की है जो जानते हुए भी उन्हें आगे बढ़ाने में लग रहे.
बेहिसाब पत्रकारिता के शिक्षण संस्थान शुरू हो रहे हैं. यहां पढऩे वाले विद्यार्थियों को पत्रकारिता को छोडक़र शेष सारी विधायें सिखायी जाती हैं. डिग्री और बेहतर नौकरी के साथ सुविधाजनक जिंदगी की चाहत लिए पत्रकारिता के नौनिहाल सवाल करना भी नहीं जानते हैं. संवाद और अध्ययन से उनकी कोसों दूरी है. कभी किसी पर इनकी खबर का केवल इंट्रों देख लीजिए तो माथा पीट लेंगे. पू्रफ रीडिंग जैसी बुनियादी सबक कभी इन्हें सिखाया नहीं गया. जुम्मा-जुम्मा चार साल की पत्रकारिता और वरिष्ठ पत्रकार का खिताब. इन सालों में एक खबर ऐसी नहीं कि जो छाप छोड़ गई हो. हालांकि निराशाजनक स्थिति के बावजूद मैं कह सकता हूं कि कुछेक विद्यार्थी हैं जो पत्रकारिता करने आये थे और पत्रकारिता कर रहे हैं. पत्रकारिता शिक्षण संस्थाओं में अध्यापन के दौरान उन्हें इस बात का भी ज्ञान नहीं दिया गया कि पत्रकारिता और मीडिया क्या है? आज पत्रकारिता दिवस है और सोशल मीडिया में निश्चित रूप से मीडिया को शुभकामनाएं दी जा रही होंगी. प्रेस की स्वतंत्रता के मायने यह नहीं है कि आपको लिखने की आजादी है. प्रेस स्वतंत्रता का अर्थ है आप सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता करें. पेजथ्री की पत्रकारिता से बाहर आकर एक बार विद्यार्थी, पराडकर, गांधी और तिलक को पढ़ें. मैं यह भी नहीं कहता कि आधुनिक संचार माध्यमों में वह सबकुछ संभव है जो पराधीन भारत की पत्रकारिता में था लेकिन जैसे सृृष्टि ने मां बनाया तो सदियां बदल जाने के बाद भी मां ही है, वैसे ही माध्यम बदल जाए, विकास हो जाए लेकिन पत्रकारिता की आत्मा जिंदा रहना चाहिए. पत्रकारिता हमारी अस्मिता है.
जब हम प्रेस स्वतंत्रता की बात करते हैं तो इन दिनों कोरोना काल में जो कुछ घट रहा है, वह हमें आईना दिखाने के लिए बेहतर है. देशभर में पत्रकारों को फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मानने के लिए सरकारों को अर्जियां दी जा रही हैं. फिर राजशाही की तरह सरकार हम पर एहसान कर कहती है कि फलां सरकार ने पत्रकारों को फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मान लिया है. समाज में शुचिता और सकरात्मकता का भाव उत्पन्न करने की जिम्मेदारी पत्रकारिता की. सरकार के प्रयासों को लोगों तक पहुंचाने की अपेक्षा पत्रकारिता से. लेकिन पत्रकारों को फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मानने के लिए सरकारों से बात करना होगी. क्या सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है कि वह हमारा ध्यान रखे? इस स्थिति के लिए भी हम दोषी हैं. रोहित सरदाना की मृत्यु हो जाती है तो हम खेमें में बंट जाते हैं. हम भूल जाते हैं कि वो भी एक पत्रकार था और हम सब भी. यह भी सच है कि जिस अखबार, पत्रिका या चैनल में काम करेेंगे, उसकी नीति के अनुरूप बोलना होगा. यह बंधन सबके लिए है. हमारी आपस की बैर और खेमेबाजी राजनीतिक दलों के लिए सुविधा पैदा करती है. आज सचमुच में प्रेस स्वतंत्र होता तो सरकारें आगे आकर फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मानने के लिए मजबूर होती लेकिन दुर्भाग्य से हम खेमेबाज पत्रकार हैं. इसलिए सब बातें बेमानी है.
उम्मीद कीजिए और भरोसा रखिए कि देश के कोने कोने से कोराना के चलते जो पत्रकार जान गंवा रहे हैं, उनसे हम सीख लें. एक साथ खड़े हो जाएं. जिस दिन हम यह साहस कर पाएंगे हर प्रबंधन को आगे आकर वेतन आयोग की शर्ते मानना होगी और सरकारों को भी. लेकिन इसके लिए इंतजार करना होगा कि क्योंकि एक ऐसी अदृश्य शक्ति है जो हमें इसमें या उसमें बांट रही है.
Sunday, December 6, 2015
सहिष्णुता-असहिष्णुता का विलाप
Thursday, March 5, 2015
एक धर्म की बिटिया
Wednesday, December 10, 2014
Friday, July 25, 2014
छोटी ही रहना चाहती हूं पापा...
Sunday, July 28, 2013
Saturday, May 18, 2013
कलम की विनम्रता
Monday, April 8, 2013
पत्रकारों की शिक्षा नहीं, शिक्षित होना ज्यादा जरूरी
Saturday, March 9, 2013
पत्रकारिता से मीडिया तक वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार की नई किताब
-अभिनव तैलंग, कला समीक्षक, भोपाल
वर्तमान में पत्रकारिता हाशिये पर है और मीडिया शब्द चलन में है. पत्रकारिता के गूढ़ अर्थ और मीडिया की व्यापकता को रेखांकित करता मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार एवं भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका समागम के सम्पादक मनोज कुमार की नई किताब पत्रकारिता से मीडिया तक का प्रकाशन वैभव प्रकाशन रायपुर ने किया है. मनोज कुमार विगत तीन दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. अपने अनुभवों को और समय समय पर लिखे गये लेखों का यह संग्रह महज संकलन न होकर एक दस्तावेज बन पड़ा है. मनोज कुमार की यह पांचवीं किताब है.
पत्रकारिता के विविध विषयों पर ऐसे आलेख हैं जो हमेशा सामयिक बने रहेंगे. किताब में शामिल पहला लेख पत्रकारिता से मीडिया तक में उन्होंने इस बात पर अफसोस जाहिर किया है कि कभी हम अर्थात श्रमजीवी कहलाते थे और आज हम मीडिया कर्मी हो गये हैं. यह एक गंभीर सवाल है जिस पर हम सबको विचार करने की जरूरत है कि हम तो हमेशा से श्रमजीवी रहे हैं और रहेंगे. इसी तरह पत्रकारिता की भाषा, पाठकों की उदासीनता, अखबार के पन्नों पर बढ़ते विज्ञापन, पेडन्यूज, पीत पत्रकारिता आदि आदि विषयों पर उनके तल्ख टिप्पणियों वाले लेख शामिल है. यह किताब कई बार मन को भीतर तक परेशान कर जाती है.
मनोज कुमार की इस किताब में कुछ अन्य आलेख सामाजिक सरोकार के हैं. वह भी समय की नब्ज पर हाथ रखते दिखते हैं. 128 पेज की इस किताब में तीस लेख शामिल किये गये हैं. छपाई खूबसूरत है और कीमत भी अधिक नहीं महज दो सौ रूपये. वैभव प्रकाशन को इस बात की दाद देनी चाहिये कि इस कठिन समय में वे ऐसी किताब छापने का साहस किया जब इसके खरीददार शायद ना मिले. यह किताब प्रोफेशनल्स के साथ ही पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिये जरूरी किताब है.
Monday, January 14, 2013
महात्मा गांधी हैं चर्चित राष्ट्रपति !
Wednesday, September 26, 2012
बापू को जन्मदिन का उपहार
-मनोज कुमारबापू इस बार आपको जन्मदिन में हम चरखा नहीं, वालमार्ट भेंट कर रहे हैं.गरीबी तो खतम नहीं कर पा रहे हैं, इसलिये गरीबों को खत्म करने का अचूक नुस्खा हमने इजाद कर लिया है. खुदरा बाजार में हम विदेशी पंूजी निवेश को अनुमति दे दी है. हमें ऐसा लगता है कि समस्या को ही नहीं, जड़ को खत्म कर देना चाहिए और आप जानते हैं कि समस्या गरीबी नहीं बल्कि गरीब है और हमारे इन फैसलों से समस्या की जड़ गरीब ही खत्म हो जाएगी. बुरा मत मानना, बिलकुल भी बुरा मत मानना. आपको तो पता ही होगा कि इस समय हम इक्कसवीं सदी में जी रहे हैं और आप हैं कि बारमबार सन् सैंतालीस की रट लगाये हुए हैं कुटीर उद्योग, कुटीर उद्योग. एक आदमी चरखा लेकर बैठता है तो जाने कितने दिनों में अपने एक धोती का धागा जुटा पाता है. आप का काम तो चल जाता था लेकिन हम क्या करें. समस्या यह भी नहीं है, समस्या है कि इन धागों से हमारी सूट और टाई नहीं बन पाती है और आपको यह तो मानना ही पड़ेगा कि इक्कसवीं सदी में जी रहे लोगों को धोती नहीं, सूट और टाई चाहिए वह भी फटाफट . हमने गांव की ताजी
सब्जी खाने की आदत छोड दी है क्योंकि डीप फ्रीजर की सब्जी हम कई दिनों बाद खा सकते हैं. दरअसल आपके विचार हमेशा से ताजा रहे हैं लेकिन हम लोग बासी विचारों को ही आत्मसात करने के आदी हो रहे हैं. बासा खाएंगे तो बासासोचेंगे भी. इसमें गलत ही क्या है?बापू माफ करना लेकिन आपको आपके जन्मदिन पर बार बार यह बात याद दिलानी होगी कि हम इक्कसवीं सदी में जी रहे हैं. जन्मदिन, वर्षगांठ बहुत घिसेपिटे और पुराने से शब्द हैं, हम तो बर्थडे और एनवरसरी मनाते हैं. अब यहां भी देखिये कि जो आप मितव्ययता की बात करते थे, उसे हम नहीं भूला पाये हैं इसलिये शादी की वर्षगांठ हो या मृत्यु , हम मितव्ययता के साथ एक ही शब्द का उपयोग करते है एनवरसरी. आप देख तो रहे होंगे कि हमारी बेटियां कितनी मितव्ययी हो गयी हैं. बहुत कम कपड़े पहनने लगी हैं. अब आप इस बात के लिये हमें दोष तो नहीं दे सकते हैं ना कि हमने आपकी मितव्ययता की सीख को जीवन में नहीं उतारा. सडक़ का नाम महात्मा गांधी रोड रख लिया और मितव्ययता की बात आयी तो इसे एम.जी. रोड कह दिया. यह एम.जी. रोड आपको हर शहर में मिल जाएगा. अभी तो यह शुरूआत है बापू, आगे आगे देखिये हम मितव्ययता के कैसे कैसे नमूने आपको दिखायेंगे.अब आप गुस्सा मत होना बापू क्योंकि हमारी सत्ता, सरकार और संस्थायें आपके नाम पर ही तो जिंदा है. आपकी मृत्यु से लेकर अब तक तो हमने आपके नाम की रट लगायी है. कांग्रेस कहती थी कि गांधी हमारे हैं लेकिन अब सब लोग कह रहे हैं कि गांधी हमारे हैं. ये आपके नाम की माया है कि सब लोग एकजुट हो गये हैं. आपकी किताब हिन्द स्वराज पर बहस हो रही है, बात हो रही है और आपके नाम की सार्थकता ढूंढ़ी जा रही है. ये बात ठीक है कि गांधी को सब लोग मान रहे हैं लेकिन गांधी की बातों को मानने वाला कोई नहीं है लेकिन क्या गांधी को मानना, गांधी को नहीं मानना है. बापू आप समझ ही गये होंगेकि इक्कसवीं सदी के लोग किस तरह और कैसे कैसे सोच रखते हैं. अब आप ही समझायें कि हम ईश्वर, अल्लाह, नानक और मसीह को तो मानते हैं लेकिन उनका कहा कभी माना क्या? मानते तो भला आपके हिन्दुस्तान में जात-पात के नाम पर कोई फसाद हो सकता था. फसाद के बाद इन नामों की माला जप कर पाप काटने की कोशिश जरूर करते हैं.बापू छोड़ो न इन बातों को, आज आपका जन्मदिन है. कुछ मीठा हो जाये. अब आप कहेंगे कि कबीर की वाणी सुन लो, इससे मीठा तो कुछ है ही नहीं. बापू फिर वही बातें, टेलीविजन के परदे पर चीख-चीख कर हमारे युग नायक अमिताभ कह रहे हैं कि चॉकलेट खाओ, अब तो वो मैगी भी खिलाने लगे हैं. बापू इन्हें थोड़ा समझाओ ना पैसा कमाने के लिये ये सब करना तो ठीक है लेकिन इससे बच्चों की सेहत बिगड़ रही है, उससे तो पैसा न कमाओ. मैं भी भला आपसे ये क्या बातें करने लगा. आपको तो पता ही नहीं होगा कि ये युग नायक कौन है और चॉकलेट मैगी क्या चीज होती है. खैर, बापू हमने शिकायत का एक भी मौका आपके लिये नहीं छोड़ा है. जानते हैं हमने क्या किया, हमने कुछ नहीं किया. सरकार ने कर डाला. अपने रिकार्ड में आपको उन्होंने कभी कहीं राष्ट्रपिता होने की बात से साफ इंकार कर दिया है. आप हमारे राष्ट्रपिता तो हैं नहीं, ये सरकार का रिकार्ड कहता है. बापू बुरा मत, मानना. कागज का क्या है, कागजपर हमारे बापू की शख्सियत थोड़ी है, बापू तो हमारे दिल में रहते हैं लेकिन सरकार को आप जरूर बहादुर सिपाही कह सकते हैं. बापू माफ करना हम इक्कसवीं सदी के लोग अब चरखा पर नहीं, वालमार्ट पर जिंदा रहेंगे. इस बार आपके बर्थडे पर यह तोहफा आपको अच्छा लगे तो मुझे फोन जरूर करना. न बापू न..फोन नहीं, मोबाइल करना और इंटरनेट की सुविधा हो तो क्या बात है..
Saturday, September 22, 2012
Friday, August 3, 2012
हाय रे, हॉकी, यही है तेरी किस्मत
Thursday, July 19, 2012
बिटिया अब नहीं जाती है पीह
Sunday, May 20, 2012
आरक्षण की राजनीति का शिकार मत बनाओ
-मनोज कुमार
भोपाल इन दिनों सिनेमा से सम्मोहित है। सिनेमा एक ऐसा सम्मोहन है जिससे बंधा हुआ हर कोई चला आता है। भोपाल को फिल्मसिटी बनाने की बात राजनीतिक गलियारे में दो दशक से ज्यादा समय से चल रही है किन्तु अब तक बातें ही बातें होती रही। राज्य के संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा के प्रयासों से बात अब निकल कर कागज पर आ गयी है और ज्यादा देर नहीं हुई तो हकीकत में फिल्म सिटी अस्तित्व में आ जाएगी। हाल फिलहाल फिल्म सिटी का मामला संस्कृति विभाग के जिम्मे है। फिल्मसिटी का बन जाना भोपाल के लिये अच्छा ही होगा। हुनरमंद लोगों से भोपाल बल्कि समूचा मध्यप्रदेश गौरवान्वित होता रहा है। फिल्मसिटी बन जाने से हुनरमंदों को काम भी मिलेगा और सम्मान भी। हालांकि यह सब बातें फिलवक्त कल्पना की है। फिलवक्त कल्पना की बातें इसलिये कि फिल्म अभी थियेटर पर चढ़ी नहीं है और टिकट की ब्लेक शुरू हो गई है। जी हां, जिन दो फिल्मों को देखकर हम शान से कहते हैं देखो वो मेरा भोपाल, उसी फिल्म के चंद सेकंड के दृश्य में लगभग एक्स्ट्रा की भूमिका में हमारे अपने मंजे हुए कलाकारों को देखकर भविष्य का अंदाजा हो जाता है। जिन कलाकारों को दबंग भूमिका में होना था उन्हें सपनों के सौदागरों ने लगभग एक्स्ट्रा की भूमिका में खड़ा कर दिया है। एक्स्ट्रा शब्द थोड़ा तल्ख है किन्तु सच भी यही है। मैं बात कर रहा हूं जनाब प्रकाश झा साहब की उन दो फिल्मों की जिन्हें देशभर में ख्याति मिली जिसमें पहली फिल्म राजनीति और दूसरी विवादों मंें घिरी फिल्म आरक्षण की।
दोनों ही फिल्मों का जादू भोपाल के वाशिंदों के सिर चढ़कर बोला। इस जादू से आम आदमी तो अभिभूत था ही बल्कि वे लोग भी अभिभूत थे जिन्हें फिल्म में एक्स्ट्रा की तरह भूमिका मिली। जिन छोटी और लगभग गुमनाम सी भूमिका निभाकर भोपाल के आले दर्जे के कलाकारों ने फिल्म में अपनी मौजूदगी का जो संतोष पाया, उसका सुख वही बता सकते हैं किन्तु मैं व्यक्तिगत तौर पर नहीं समझता कि जिस आलोक चटर्जी को एनएसडी में बेहतरीन अभिनय के लिये गोल्ड मेडल मिला हो, उन्हें गुमनाम सी भूमिका में होना चाहिए। आलोक जैसे पहले पंक्ति के अभिनेता को नामालूम सी भूमिका के लिये प्रकाश झा ने किन शर्तों पर तैयार किया, यह भी मैं नहीं जानता किन्तु यह जरूर जानता हूं कि प्रकाश झा ने एक आले दर्जे के कलाकार को नेपथ्य में खड़ा कर दिया। आलोक ही क्यों, बच्चों के चच्चा, मशहूर नाट्य निर्देशक और बेहतरीन कलाकार केजी त्रिवेदी भी आरक्षण में हाशिये पर खड़े दिखायी दिये। कुछ ऐसा ही हाल भोपाल के दूसरे आले दर्जे के कलाकारों के साथ हुआ है। पहले राजनीति में और इसके बाद आरक्षण में।
यह तथ्य को भी याद रखना चाहिए कि प्रकाश झा और दूसरे सिनेमाई दिग्गज २०११ में फिल्म बनाने आ रहे हैं लेकिन रजतपट पर मध्यप्रदेश का दखल बीते कई दशकों से रहा है। लता मंगेशकर से लेकर किशोर कुमार और जया भादुड़ी से लेकर जॉनी वाकर रजत पट के सितारे हैं तो मध्यप्रदेश को इन पर गर्व है। ये तो महज बानगी है, फेहरिस्त तो इतनी लम्बी है कि नाम गिनाते गिनाते ही सूची लम्बी बन जाए। इन सभी लोगों ने रजत पट पर अपनी छाप छोड़ी है। अविभाजित मध्यप्रदेश और विभाजन के बाद बने छत्तीसगढ़ राज्य के प्रतिभा सम्पन्न कलाकारों ने रजतपट पर अपनी जगह बनायी है। बहुत समय नहीं गुजरा जब पीपली लाइव ने पूरे देश का ध्यान खींचा तो मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कलाकारों के कारण। हमारे कलाकार केनवास में गढ़े नहीं गये हैं बल्कि उनका रिश्ता जमीन से है और एक जमीन का कलाकार जब मंच पर आता है या पर्दे पर तो वह अपनी अदायगी से सबको मोह लेता है। इन सभी लोगों को रजतपट पर सम्मानजनक स्थान मिला क्योंकि ये लोग मुंबई में चुनौतियों से जूझते हुए अपनी जगह बनायी।
मध्यप्रदेश को हिन्दुस्तान का दिल कहा जाता है और इस प्रदेश का निर्माण देश के विभिन्न भूभागों को मिलाकर हुआ है। एक बड़े हिन्दी प्रदेश का गौरव प्राप्त इस प्रदेश की तकनीकी कठिनाई यह है कि यह अलग अलग बोली और भाषाओं का प्रदेश है और यहां बनने वाली हर फिल्म का स्वरूप प्रादेशिक न होकर आंचलिक होता है। मसलन बुंदेलखंडी, मालवी आदि इत्यादि। मध्यप्रदेश को प्रतिबिम्बित करने वाली फिल्म का निर्माण में बाधा है जबकि राजस्थान, बिहार, यूपी और अभी हाल में बने छत्तीसगढ़ भी इस तकनीकी दिक्कत से मुक्त है। यदि यह दिक्कत नही होती तो मध्यप्रदेश अन्य प्रदेशांे की तरह फिल्म निर्माण में झंडे गाड़ रहा होता।
बहरहाल, बात साफ है कि ये सिनेमा बनाने वाले भोपाल पर फिदा होकर नहीं आ रहे हैं बल्कि पूरा हिसाब-किताब लगाकर आ रहे हैं। कास्ट कटिंग के इस दौर में भोपाल में फिल्म बनाना न केवल इनके लिये सस्ता सौदा है बल्कि रजतपट पर अपना चेहरा दिखाने की ख्वाहिश लिये जवान, प्रतिभावान कलाकार और तकनीकीशियन मुफ्त में अथवा मुफ्त के भाव मिल जाते हैं। अस्पताल, होटल, गाड़ी, मजदूर और लगभग इसी मुफ्त के भाव में स्थानीय अखबारों और पत्रिकाओं में पब्लिसिटी। यह बात तो तय है कि इतनी सुविधाएं इन सौदागरों को मुंबई में मयस्सर नहीं है और ऐसे में मध्यप्रदेश के दिल में फिल्मसिटी बनाये जाने का ख्वाब जग जाए तो सपनों के इन सौदागरों के तो पौबारह हो रहे हैं। भोपाल में फिल्मसिटी अभी प्रोसेस में है किन्तु पहली पंक्ति के कलाकारों को एक्स्ट्रा जैसी भूमिका में रखने की शुरूआत हो गई है। यह रस्मी शुरूआत नहीं है बल्कि यह एक परम्परा की नींव डालने की शुरूआत है। सवाल गंभीर है और इस पर अभी से बहस-मुबाहिसा होना चाहिए। जिन कलाकारों के अभिनय को देखकर हम मंत्रमुग्ध हो जाते हैं, उन्हें इस तरह अभिनय करते देख मन रो उठता है। सिनेमाई सौदागरों की यह राजनीति और फिल्म में आरक्षण की इस परम्परा का यहीं अंत होना चाहिए।
याद कर लीजिए इसी षहर का एक आदमी इन्हीं सौदागरों से मुंहमांगी कीमत वसूलता है और उन्हें देना पड़ता है। इस शख्स का नाम है जयंत देशमुख। जयंत भारत भवन से चमकने वाला एक तारा है जिसने खुद को साबित करने के लिये मुंबई की ट्रेन पकड़ ली। रायपुर से भोपाल और भोपाल से मुंबई के बीच का सफर जयंत के लिये आसान नहीं रहा होगा। चुनौतियों से जूझते जयंत के पास प्रतिभा थी और स्वयं पर विश्वास। आखिरकार उसने जगह बना ली। संभव है कि जयंत को अब इन लोगों से नहीं बल्कि इन लोगों को जयंत से समय लेने के लिये टेलीफोन करना पड़ता होगा। राजीव वर्मा भी इसी शहर से हैं। आला दर्जे के अभिनेता हैं और भोपाल रंगमंच में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। भले ही वे अभिताभ बच्चन के नातेदार हांे लेकिन मुंबई में अपने लिये स्पेस बनाने में उन्हें भी संघर्ष करना पड़ा होगा। उन्होंने किसी भी फिल्म अथवा टेलीविजन सीरियल में गुमनाम किरदार की भूमिका नहीं निभायी। टीवी सीरियल चुनौती से अपना अभिनय शुरू करने वाले राजीव वर्मा ने राजश्री की फिल्मों में सम्मानजनक भूमिका निभायी है। उनका यह सिलसिला अब तक जारी है और बना रहेगा।
जयंत देशमुख एवं राजीव वर्मा की मिसाल इसलिये दी जा रही है कि रजतपट पर अपनी जगह बनाने के लिये चुनौतियों का सामना इन्हें करना पड़ा था और जो लोग इस सम्मोहनी दुनिया मंे आना चाहते हैं उन्हें भी इन चुनौतियों का सामना करना होगा। सिनेमा का सम्मोहन आपको खींचता है तो आपको संघर्ष के लिये स्वयं को तैयार करना होगा। इन सौदागरों को बताना होगा कि जिन्हें आप मुंबई से ढोकर लाते हैं, जिन्हें आप प्रतिभावान कहते हैं, हमारी प्रतिभा उन्हें कम नहीं है। एक बार हम पर दांव तो खेलकर देखिये जनाब। यह सब आसान नहीं है किन्तु शुरूआत तो करनी ही होगा। हमें अपनी कीमत खुद आंकनी होगी। हम तय करेंगे अपना मोल। फिल्म मुंबई मंे बने या भोपाल में, हम कलाकार फिल्म में आएंगे तो छा जाने के लिये। कुछ पल में गुम हो जाने के लिये नहीं। भीड़ में खो जाने के लिये नहीं। जिस तरह के अभिनय की जगह रंगमंच के हमारे पहले पंक्ति के कलाकारों को दी जा रही है, उसे न करना ही बेहतर होगा। ना करना भी हमारे इन उम्दा कलाकारों को सीखना होगा।

