Wednesday, September 26, 2012

बापू को जन्मदिन का उपहार


 
-मनोज कुमार
बापू इस बार आपको जन्मदिन में हम चरखा नहीं, वालमार्ट भेंट कर रहे हैं.गरीबी तो खतम नहीं कर पा रहे हैं, इसलिये  गरीबों को  खत्म करने का अचूक नुस्खा हमने इजाद कर लिया है. खुदरा बाजार में हम विदेशी पंूजी निवेश को अनुमति दे दी है. हमें ऐसा लगता है कि समस्या को ही नहीं, जड़ को खत्म कर देना चाहिए और आप जानते हैं कि समस्या गरीबी नहीं बल्कि गरीब है और हमारे इन फैसलों से समस्या की जड़ गरीब ही खत्म हो जाएगी. बुरा मत मानना, बिलकुल भी बुरा मत मानना. आपको तो पता ही होगा कि इस समय हम इक्कसवीं सदी में जी रहे हैं और आप हैं कि बारमबार सन् सैंतालीस की रट लगाये हुए हैं कुटीर उद्योग, कुटीर उद्योग. एक आदमी चरखा लेकर बैठता है तो जाने कितने दिनों में अपने एक धोती का धागा जुटा पाता है. आप का काम तो चल जाता था  लेकिन हम क्या करें. समस्या यह भी नहीं है, समस्या है कि इन धागों से हमारी सूट और टाई नहीं बन पाती है और आपको यह तो मानना ही पड़ेगा कि इक्कसवीं सदी में जी रहे लोगों को धोती नहीं, सूट और टाई चाहिए वह भी फटाफट  . हमने गांव की ताजी
सब्जी खाने की आदत छोड दी है क्योंकि डीप फ्रीजर की सब्जी हम कई दिनों बाद खा सकते हैं. दरअसल आपके विचार हमेशा से ताजा रहे हैं लेकिन हम लोग बासी विचारों को ही आत्मसात करने के आदी हो रहे हैं. बासा खाएंगे तो बासा
सोचेंगे भी. इसमें गलत ही क्या है?
        बापू माफ करना लेकिन आपको आपके जन्मदिन पर बार बार यह बात याद दिलानी होगी कि हम इक्कसवीं सदी में जी रहे हैं. जन्मदिन, वर्षगांठ बहुत घिसेपिटे और पुराने से शब्द हैं, हम तो बर्थडे और एनवरसरी मनाते हैं. अब यहां भी देखिये कि जो आप मितव्ययता की बात करते थे, उसे हम नहीं भूला पाये हैं इसलिये शादी की वर्षगांठ हो या मृत्यु ,  हम मितव्ययता के साथ एक ही शब्द का उपयोग करते है एनवरसरी. आप देख तो रहे होंगे कि हमारी बेटियां कितनी मितव्ययी हो गयी हैं. बहुत कम कपड़े पहनने लगी हैं. अब आप इस बात के लिये हमें दोष तो नहीं दे सकते हैं ना कि हमने आपकी मितव्ययता की सीख को जीवन में नहीं उतारा. सडक़ का नाम महात्मा गांधी रोड रख लिया और मितव्ययता की बात आयी तो इसे एम.जी. रोड कह दिया. यह एम.जी. रोड आपको हर शहर में मिल जाएगा. अभी तो यह शुरूआत है बापू, आगे आगे देखिये हम मितव्ययता के कैसे कैसे नमूने आपको दिखायेंगे.
        अब आप गुस्सा मत होना बापू क्योंकि हमारी सत्ता, सरकार और संस्थायें आपके नाम पर ही तो जिंदा है. आपकी मृत्यु से लेकर अब तक तो हमने आपके नाम की रट लगायी है. कांग्रेस कहती थी कि गांधी हमारे हैं लेकिन अब सब लोग कह रहे हैं कि गांधी हमारे हैं. ये आपके नाम की माया है कि सब लोग एकजुट हो गये हैं. आपकी किताब  हिन्द स्वराज पर बहस हो रही है, बात हो रही है और आपके नाम की सार्थकता ढूंढ़ी जा रही है. ये बात ठीक है कि गांधी को सब लोग मान रहे हैं लेकिन गांधी की बातों को मानने वाला कोई नहीं है लेकिन क्या गांधी को मानना, गांधी को नहीं मानना है. बापू आप समझ ही गये होंगेकि इक्कसवीं सदी के लोग किस तरह और कैसे कैसे सोच रखते हैं. अब आप ही समझायें कि हम ईश्वर, अल्लाह, नानक और मसीह को तो मानते हैं लेकिन उनका कहा कभी माना क्या? मानते तो भला आपके हिन्दुस्तान में जात-पात के नाम पर कोई फसाद हो सकता था. फसाद के बाद इन नामों की माला जप कर पाप काटने की कोशिश जरूर करते हैं.
बापू छोड़ो न इन बातों को, आज आपका जन्मदिन है. कुछ मीठा हो जाये. अब आप कहेंगे कि कबीर की वाणी सुन लो, इससे मीठा तो कुछ है ही नहीं. बापू फिर वही बातें, टेलीविजन के परदे पर चीख-चीख कर हमारे युग नायक अमिताभ कह रहे हैं कि चॉकलेट खाओ, अब तो वो मैगी भी खिलाने लगे हैं. बापू इन्हें थोड़ा समझाओ ना पैसा कमाने के लिये ये सब करना तो ठीक है लेकिन इससे बच्चों की सेहत बिगड़ रही है, उससे तो पैसा न कमाओ. मैं भी भला आपसे ये क्या बातें करने लगा. आपको तो पता ही नहीं होगा कि ये युग नायक कौन है और चॉकलेट मैगी क्या चीज होती है. खैर, बापू हमने शिकायत का एक भी मौका आपके लिये नहीं छोड़ा है. जानते हैं हमने क्या किया, हमने कुछ नहीं किया. सरकार ने कर डाला. अपने रिकार्ड में आपको उन्होंने कभी कहीं राष्ट्रपिता होने की बात से साफ इंकार कर दिया है. आप हमारे राष्ट्रपिता तो हैं नहीं, ये सरकार का रिकार्ड कहता है. बापू बुरा मत, मानना. कागज का क्या है, कागज
पर हमारे बापू की शख्सियत थोड़ी है, बापू तो हमारे दिल में रहते हैं लेकिन सरकार को आप जरूर बहादुर सिपाही कह सकते हैं. बापू माफ करना हम इक्कसवीं सदी के लोग अब चरखा पर नहीं, वालमार्ट पर जिंदा रहेंगे. इस बार आपके बर्थडे पर यह तोहफा आपको अच्छा लगे तो मुझे फोन जरूर करना. न बापू न..फोन नहीं, मोबाइल करना और इंटरनेट की सुविधा हो तो क्या बात है..

Friday, August 3, 2012

हाय रे, हॉकी, यही है तेरी किस्मत


मनोज कुमार
बापू और हॉकी का हाल एक जैसा हो गया है। सूचना के अधिकार के तहत कुछ महीने पहले जानकारी मांगी गयी थी कि किस कानून के तहत महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता की पदवी दी गयी है तो भारत सरकार ने खुलासा किया था कि महात्मा गांधी को इस तरह की कोई पदवी नहीं दी गई है। अब हॉकी को लेकर भारत सरकार के मंत्रालय ने हॉकी को राष्ट्रीय खेल मानने से मना कर दिया है। यह खुलासा भी सूचना के अधिकार के तहत मांगी गयी जानकारी में हुआ है। हॉकी को भारत में किसी खेल की तरह नहीं लिया जाता है बल्कि इस खेल के साथ हमारी अस्मिता को जोड़ कर देखा जाता है। बिलकुल उसी तरह जिस तरह कोई कानून महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता माने या न माने भारत और पूरा संसार उन्हें राष्ट्रपिता कहने में स्वयं गर्व की अनुभूति करता है। स्वाधीनता के छह दषक गुजर जाने के बाद आज जब हमंे यह पता चलता है कि हॉकी को राष्ट्रीय खेल का दर्जा ही नहीं है तो यह हम सबके लिये षर्मनाक है। दुर्भाग्यजनक है कि छह दषक गुजर जाने के बाद भी हम हॉकी को कानूनन राष्ट्रीय खेल घोषित नहीं कर पाये।
खेलों के विकास के लिये राष्ट्रीय स्तर से लेकर राज्य स्तर तक लगातार कोषिषें हो रही हैं। हर साल करोड़ों रुपये स्वाहा किये जा रहे हैं लेकिन हमारा खेल का स्तर सुधर नहीं सका है तो ऐसी जानकारियां इसके बुनियाद में हैं। स्मरण रखा जाना चाहिए कि जिन खेलों को हाषिये पर रखा गया है उनमें एक हॉकी भी है। हॉकी पैसों के लिये नहीं देष के लिये खेला जाता है। यह अलग बहस का मुद्दा हो सकता है कि हॉकी को सम्मान दिलाने के लिये और हॉकी खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाने के लिये केन्द्र सरकार क्या कर रही है अथवा नहीं कर रही है। फिलवक्त तो हॉकी का राष्ट्रीय खेल नहीं होने का यक्ष प्रष्न हमारे सामने है। हॉकी खिलाड़ियों को पर्याप्त खाना नहीं देना, वेतन भत्ते के लाले, खिलाड़ियों के नाम पर अफसरों का जेब गर्म होने की खबरें यदा-कदा आती रही हैं। खेल और खिलाड़ी की चिंता किसी को नहीं रही है। यदि ऐसा होता तो आज हॉकी को राष्ट्रीय खेल होने का गर्व हासिल होता और हम भारतीय गर्व से कहते कि हॉकी हमारी षान है। बदकिस्मती से हमारा सिर षर्म से झुक गया है।
मध्यप्रदेष इस बात के लिये षाबासी का हकदार है कि उसने हॉकी को उसका सम्मान दिलाने और खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिये हरसंभव प्रयास किया है। अभी हो रहे ओलंपिक खेलों में हॉकी में मध्यप्रदेष का षिवेन्द्र इस बात का उदाहरण है। मध्यप्रदेष सरकार हॉकी के बेहतरी के लिये जो उपक्रम कर रही है, उसकी न केवल देषव्यापी सराहना हुई है बल्कि हॉकी खिलाड़ियों को इस बात का संतोष है कि कोई सरकार तो है जो हॉकी को बचाने में जुटी हुई है। भोपाल कभी हॉकी की नर्सरी कहलाता था। विष्वमंच पर भोपाल से जितने बेहतरीन हॉकी खिलाड़ी मध्यप्रदेष ने दिये, वह हॉकी के इतिहास का स्वर्णिम पन्ना है। एक बार फिर हॉॅकी के मैदान में मध्यप्रदेष की दुदुंभी बजे, इस बात का प्रयास राज्य सरकार कर रही है। एस्टो टर्फ का बिछना और हरसंभव मदद के लिये आगे आना, इस बात का संकेत है।
बहरहाल, भारत सरकार ने हॉकी को राष्ट्रीय खेल मानने से इंकार किया है, उसे महज एक सवाल का जवाब मानकर नहीं टाला जा सकता बल्कि इसके लिये उन तथ्यांे और तर्कों की खोज करना होगी कि आखिर हॉकी को अब तक राष्ट्रीय खेल का दर्जा क्यों नहीं दिया जा सका है। हॉकी को राष्ट्रीय खेल का दर्जा दिलाने के लिये देषव्यापी अभियान चलाने की जरूरत होगी और भारत सरकार पर दबाव बनाना होगा। हॉकी अब तक काननून भले ही राष्ट्रीय खेल नहीं बन सका हो किन्तु हॉकी हर भारतीय के लिये राष्ट्रीय खेल का ही महत्व रखता है।

Thursday, July 19, 2012

बिटिया अब नहीं जाती है पीह

मनोज कुमार
अभी अभी मेरी पत्नी अपने मोबाइल फोन से फारिंग हुई है. बीस मिनट से ज्यादा हो गये होंगे बतियाते हुए. पूछने पर पता चला कि अपनी मम्मी से बातें कर रही थी. क्या खाया, क्या पकाया, कौन आया और कौन गया से लेकर वो सारी बातें जो महीनों बाद पीहर पहुंच कर कभी बिटिया अपनी अम्मां से करती थी, अब हर दिन बल्कि हर पहर हो रही है. कोसों का फासला खत्म सा हो गया है. जब मन किया, मोबाइल का बटन दबाया और सेकंड में बातों का सिलसिला शुरू. न आने जाने की परेशानी और न साज समान की. अब बीवियां पीहर जाने का नाम नहीं लेती हैं. उनका पीहर तो मोबाइल हो गया है. कभी पीहर जाने के लिये उतावली रहने वाली बीवियां अब नहीं जाने का बहाना ढूंढ़ती हैं. पतिदेव जिद करें कि कुछ दिनों के लिये पीहर हो आओ तो वे उन पर उलटे अहसान मढ़ते हुए कहेंगी आपके और बच्चों का रूटीन डिस्टर्ब हो जाता है, इसलिये वे नहीं जाना चाहतीं.
मोबाइल ने सुविधा तो दी है लेकिन कई चीजें खत्म भी कर दी है. किसी ब्याहता का पीहर जाना, केवल पीहर जाना नहीं होता था बल्कि इसके पीछे एक सामाजिक ताना-बाना होता था. पति-पत्नी के बीच की एकरसता को खत्म करने का यह एक अवसर होता था. रिश्तों की गर्माहट को महसूस करने का अवसर मिलता था. परिवार में ताजगी का अहसास होता था. इनके जाने और उनके नहीं रहने के बीच का फर्क महसूस होता था, यह फर्क अब नहीं रहा. एक मोबाइल ने जिंदगी की ताजगी को छीन लिया है. जब मोबाइल नहीं था तो बीवी के पास पीहर जाने का उत्साह होता था. उसे यह जान लेने की उत्सुकता होती थी कि उसकी गैरहाजिरी में अम्मां ने क्या क्या खरीदा है? ब्याहने के बाद अम्मां की मोहब्बत कम तो नहीं हुई, यह जांचने की कोशिश भी अनजाने में बिटिया करती थी. कदाचित अम्मां ने अपनी बहू के लिये बिटिया से कुछ अधिक खरीद लिया तो बिटिया तुनक कर कहती- हां, अब तो मैं परायी हो गयी हूं, अपनी बहू के लिये सब करेगी. बिटिया की इस मासूम शिकायत पर अम्मां न्यौछावर हो जाती. उसे मनाती और बताती कि ऐसा नहीं है.
रूठने और मनाने की इस गर्माहट को भी मोबाइल ने छीन लिया है. पीहर जाकर बिटिया अपने बचपन की यादों को टटोलती, संगी-सहेलियों के बारे में पूछती लेकिन अब मोबाइल इनका पता तो नहीं देगा? पीहर से लौटती बिटिया के आंखों में लरजते आंसू अम्मां को भी रूला जाते थे यह आंसू तब तक थमे रहते जब तक कि बिटिया वापस लौट आने की बात नहीं कहती. पीहर से ससुराल के रास्ते भी बहू के लौट जाने की प्रतीक्षा करते रहते. पतिदेव को अपनी पत्नी के लौट आने का बेसब्री से इंतजार रहता. जिस पत्नी से वह तंग आ चुका होता है, उसके नहीं रहने पर उसे तनहाई डसने लगती है. पत्नी के लौट आने पर पति थोड़ा नाराज दिखता है और पत्नी मनुहार करने बैठ जाती है. अपने घर के बिखर जाने का गम भी उसे रहता था. बात बात में पति और बच्चों को ताना कि उसके नहीं रहने पर घर की क्या हालत बना दी है.
रूठने, मनाने, शिकायत और प्रार्थना अब बीती जमाने की बातें रह गयी है क्योंकि बिटिया अब नहीं जाती है पीहर. महीनों बाद पीहर जाकर मां की खरीदी चीजें, बचपन की यादें और आने जाने वाले का ब्यौरा सुनने और सुनाने का काम भी इस मोबाइल ने खत्म कर दिया है. रोज मां से खबर मिल जाती है. क्या लिया और कितने में लिया, कौन आया, कौन गया और इधर से भी मां को रिपोर्ट हो जाती है कि आज सब्जी में क्या बना और कल की क्या प्लानिंग है. ब्याह के शुरूआती दिनों में पीहर छूट जाने का दुख होता है लेकिन समय गुजर जाने के बाद पति का घर प्यारा लगने लगता है. जो थोड़ी कसर इस मोबाइल से रह गयी थी, वह कसर इंटरनेट ने पूरी कर दी. कैमरे लगाया और पूरा पीहर अपने घर में बैठे घूूम लिया, देख लिया. मां की सूरत भी देख ली और पीहर की दीवारों का रंग भी जान लिया. बिटिया अब नहीं जाती है पीहर.

Sunday, May 20, 2012

आरक्षण की राजनीति का शिकार मत बनाओ

-मनोज कुमार
भोपाल इन दिनों सिनेमा से सम्मोहित है। सिनेमा एक ऐसा सम्मोहन है जिससे बंधा हुआ हर कोई चला आता है। भोपाल को फिल्मसिटी बनाने की बात राजनीतिक गलियारे में दो दशक से ज्यादा समय से चल रही है किन्तु अब तक बातें ही बातें होती रही। राज्य के संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा के प्रयासों से बात अब निकल कर कागज पर आ गयी है और ज्यादा देर नहीं हुई तो हकीकत में फिल्म सिटी अस्तित्व में आ जाएगी। हाल फिलहाल फिल्म सिटी का मामला संस्कृति विभाग के जिम्मे है। फिल्मसिटी का बन जाना भोपाल के लिये अच्छा ही होगा। हुनरमंद लोगों से भोपाल बल्कि समूचा मध्यप्रदेश गौरवान्वित होता रहा है। फिल्मसिटी बन जाने से हुनरमंदों को काम भी मिलेगा और सम्मान भी। हालांकि यह सब बातें फिलवक्त कल्पना की है। फिलवक्त कल्पना की बातें इसलिये कि फिल्म अभी थियेटर पर चढ़ी नहीं है और टिकट की ब्लेक शुरू हो गई है। जी हां, जिन दो फिल्मों को देखकर हम शान से कहते हैं देखो वो मेरा भोपाल, उसी फिल्म के चंद सेकंड के दृश्य में लगभग एक्स्ट्रा की भूमिका में हमारे अपने मंजे हुए कलाकारों को देखकर भविष्य का अंदाजा हो जाता है। जिन कलाकारों को दबंग भूमिका में होना था उन्हें सपनों के सौदागरों ने लगभग एक्स्ट्रा की भूमिका में खड़ा कर दिया है। एक्स्ट्रा शब्द थोड़ा तल्ख है किन्तु सच भी यही है। मैं बात कर रहा हूं जनाब प्रकाश झा साहब की उन दो फिल्मों की जिन्हें देशभर में ख्याति मिली जिसमें पहली फिल्म राजनीति और दूसरी विवादों मंें घिरी फिल्म आरक्षण की।
दोनों ही फिल्मों का जादू भोपाल के वाशिंदों के सिर चढ़कर बोला। इस जादू से आम आदमी तो अभिभूत था ही बल्कि वे लोग भी अभिभूत थे जिन्हें फिल्म में एक्स्ट्रा की तरह भूमिका मिली। जिन छोटी और लगभग गुमनाम सी भूमिका निभाकर भोपाल के आले दर्जे के कलाकारों ने फिल्म में अपनी मौजूदगी का जो संतोष पाया, उसका सुख वही बता सकते हैं किन्तु मैं व्यक्तिगत तौर पर नहीं समझता कि जिस आलोक चटर्जी को एनएसडी में बेहतरीन अभिनय के लिये गोल्ड मेडल मिला हो, उन्हें गुमनाम सी भूमिका में होना चाहिए। आलोक जैसे पहले पंक्ति के अभिनेता को नामालूम सी भूमिका के लिये प्रकाश झा ने किन शर्तों पर तैयार किया, यह भी मैं नहीं जानता किन्तु यह जरूर जानता हूं कि प्रकाश झा ने एक आले दर्जे के कलाकार को नेपथ्य में खड़ा कर दिया। आलोक ही क्यों, बच्चों के चच्चा, मशहूर नाट्य निर्देशक और बेहतरीन कलाकार केजी त्रिवेदी भी आरक्षण में हाशिये पर खड़े दिखायी दिये। कुछ ऐसा ही हाल भोपाल के दूसरे आले दर्जे के कलाकारों के साथ हुआ है। पहले राजनीति में और इसके बाद आरक्षण में।
यह तथ्य को भी याद रखना चाहिए कि प्रकाश झा और दूसरे सिनेमाई दिग्गज २०११ में फिल्म बनाने आ रहे हैं लेकिन रजतपट पर मध्यप्रदेश का दखल बीते कई दशकों से रहा है। लता मंगेशकर से लेकर किशोर कुमार और जया भादुड़ी से लेकर जॉनी वाकर रजत पट के सितारे हैं तो मध्यप्रदेश को इन पर गर्व है। ये तो महज बानगी है, फेहरिस्त तो इतनी लम्बी है कि नाम गिनाते गिनाते ही सूची लम्बी बन जाए। इन सभी लोगों ने रजत पट पर अपनी छाप छोड़ी है। अविभाजित मध्यप्रदेश और विभाजन के बाद बने छत्तीसगढ़ राज्य के प्रतिभा सम्पन्न कलाकारों ने रजतपट पर अपनी जगह बनायी है। बहुत समय नहीं गुजरा जब पीपली लाइव ने पूरे देश का ध्यान खींचा तो मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कलाकारों के कारण। हमारे कलाकार केनवास में गढ़े नहीं गये हैं बल्कि उनका रिश्ता जमीन से है और एक जमीन का कलाकार जब मंच पर आता है या पर्दे पर तो वह अपनी अदायगी से सबको मोह लेता है। इन सभी लोगों को रजतपट पर सम्मानजनक स्थान मिला क्योंकि ये लोग मुंबई में चुनौतियों से जूझते हुए अपनी जगह बनायी।
मध्यप्रदेश को हिन्दुस्तान का दिल कहा जाता है और इस प्रदेश का निर्माण देश के विभिन्न भूभागों को मिलाकर हुआ है। एक बड़े हिन्दी प्रदेश का गौरव प्राप्त इस प्रदेश की तकनीकी कठिनाई यह है कि यह अलग अलग बोली और भाषाओं का प्रदेश है और यहां बनने वाली हर फिल्म का स्वरूप प्रादेशिक न होकर आंचलिक होता है। मसलन बुंदेलखंडी, मालवी आदि इत्यादि। मध्यप्रदेश को प्रतिबिम्बित करने वाली फिल्म का निर्माण में बाधा है जबकि राजस्थान, बिहार, यूपी और अभी हाल में बने छत्तीसगढ़ भी इस तकनीकी दिक्कत से मुक्त है। यदि यह दिक्कत नही होती तो मध्यप्रदेश अन्य प्रदेशांे की तरह फिल्म निर्माण में झंडे गाड़ रहा होता।
बहरहाल, बात साफ है कि ये सिनेमा बनाने वाले भोपाल पर फिदा होकर नहीं आ रहे हैं बल्कि पूरा हिसाब-किताब लगाकर आ रहे हैं। कास्ट कटिंग के इस दौर में भोपाल में फिल्म बनाना न केवल इनके लिये सस्ता सौदा है बल्कि रजतपट पर अपना चेहरा दिखाने की ख्वाहिश लिये जवान, प्रतिभावान कलाकार और तकनीकीशियन मुफ्त में अथवा मुफ्त के भाव मिल जाते हैं। अस्पताल, होटल, गाड़ी, मजदूर और लगभग इसी मुफ्त के भाव में स्थानीय अखबारों और पत्रिकाओं में पब्लिसिटी। यह बात तो तय है कि इतनी सुविधाएं इन सौदागरों को मुंबई में मयस्सर नहीं है और ऐसे में मध्यप्रदेश के दिल में फिल्मसिटी बनाये जाने का ख्वाब जग जाए तो सपनों के इन सौदागरों के तो पौबारह हो रहे हैं। भोपाल में फिल्मसिटी अभी प्रोसेस में है किन्तु पहली पंक्ति के कलाकारों को एक्स्ट्रा जैसी भूमिका में रखने की शुरूआत हो गई है। यह रस्मी शुरूआत नहीं है बल्कि यह एक परम्परा की नींव डालने की शुरूआत है। सवाल गंभीर है और इस पर अभी से बहस-मुबाहिसा होना चाहिए। जिन कलाकारों के अभिनय को देखकर हम मंत्रमुग्ध हो जाते हैं, उन्हें इस तरह अभिनय करते देख मन रो उठता है। सिनेमाई सौदागरों की यह राजनीति और फिल्म में आरक्षण की इस परम्परा का यहीं अंत होना चाहिए।
याद कर लीजिए इसी षहर का एक आदमी इन्हीं सौदागरों से मुंहमांगी कीमत वसूलता है और उन्हें देना पड़ता है। इस शख्स का नाम है जयंत देशमुख। जयंत भारत भवन से चमकने वाला एक तारा है जिसने खुद को साबित करने के लिये मुंबई की ट्रेन पकड़ ली। रायपुर से भोपाल और भोपाल से मुंबई के बीच का सफर जयंत के लिये आसान नहीं रहा होगा। चुनौतियों से जूझते जयंत के पास प्रतिभा थी और स्वयं पर विश्वास। आखिरकार उसने जगह बना ली। संभव है कि जयंत को अब इन लोगों से नहीं बल्कि इन लोगों को जयंत से समय लेने के लिये टेलीफोन करना पड़ता होगा। राजीव वर्मा भी इसी शहर से हैं। आला दर्जे के अभिनेता हैं और भोपाल रंगमंच में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। भले ही वे अभिताभ बच्चन के नातेदार हांे लेकिन मुंबई में अपने लिये स्पेस बनाने में उन्हें भी संघर्ष करना पड़ा होगा। उन्होंने किसी भी फिल्म अथवा टेलीविजन सीरियल में गुमनाम किरदार की भूमिका नहीं निभायी। टीवी सीरियल चुनौती से अपना अभिनय शुरू करने वाले राजीव वर्मा ने राजश्री की फिल्मों में सम्मानजनक भूमिका निभायी है। उनका यह सिलसिला अब तक जारी है और बना रहेगा।
जयंत देशमुख एवं राजीव वर्मा की मिसाल इसलिये दी जा रही है कि रजतपट पर अपनी जगह बनाने के लिये चुनौतियों का सामना इन्हें करना पड़ा था और जो लोग इस सम्मोहनी दुनिया मंे आना चाहते हैं उन्हें भी इन चुनौतियों का सामना करना होगा। सिनेमा का सम्मोहन आपको खींचता है तो आपको संघर्ष के लिये स्वयं को तैयार करना होगा। इन सौदागरों को बताना होगा कि जिन्हें आप मुंबई से ढोकर लाते हैं, जिन्हें आप प्रतिभावान कहते हैं, हमारी प्रतिभा उन्हें कम नहीं है। एक बार हम पर दांव तो खेलकर देखिये जनाब। यह सब आसान नहीं है किन्तु शुरूआत तो करनी ही होगा। हमें अपनी कीमत खुद आंकनी होगी। हम तय करेंगे अपना मोल। फिल्म मुंबई मंे बने या भोपाल में, हम कलाकार फिल्म में आएंगे तो छा जाने के लिये। कुछ पल में गुम हो जाने के लिये नहीं। भीड़ में खो जाने के लिये नहीं। जिस तरह के अभिनय की जगह रंगमंच के हमारे पहले पंक्ति के कलाकारों को दी जा रही है, उसे न करना ही बेहतर होगा। ना करना भी हमारे इन उम्दा कलाकारों को सीखना होगा।

Saturday, May 12, 2012

एक दिन की मां !



-मनोज कुमार
बहुत सालों से और बहुत बार मां की एक कहानी सुनता आ रहा हूं। मां और उसका एक बेटा था। गरीब और विपन्न। पिता का साया उठ गया था। बेटे की चिंता करती मां को रात रात भर नींद नहीं आती थी। खुद भूखे रहकर बेटे को खाना खिलाती। दिन गुजरते गये। बेटा निकम्मा और आवारा हो गया था। मां को चिंता लगी रहती कि उसके मर जाने के बाद क्या होगा। दिन मां अपने निकम्मे और नाकारा बेटे को दुनियादारी समझाने बैठी तो बेटे को गुस्सा आ गया। गुस्से में फरसे से मां की गर्दन उड़ा दी। कटी गर्दन से आवाज आयी, बेटे तुम्हें चोट तो नहीं लगी? मां की यह सूरत हम भारत के हर गांव और घर में पाते हैं। इस दुलारी मां को बाजार ने प्रोडक्ट बना दिया है मदर्स डे के रूप में। जो मां अपनी कोख में नौ महीने हमें रखे और अंगुली पकड़कर दुनियादारी के लायक बनाये, उस मां के लिये हमारे पास बस एक दिन! सुन कर और सोचकर मन जख्मी हो जाता है। इस निगोड़े बाजार ने न केवल मां के लिये एक दिन तय किया है बल्कि हर रिश्तों के लिये उसके पास एक एक दिन है। बाजार चाहता है कि साल के तीन सौ पैंसठ दिन, दिन न रहकर उत्सव बन जाएं। इन उत्सवी दिनों के बहाने बाजार चल पड़े। करोड़ों का सौदा-सुलह हो। जिसे उपहार मिले उसका मन खिल जाए और जिसे न मिले वह कलह मचा डाले। देने वाले को गरूर हो कि वह कितना महंगा तोहाफा दे सकता है और पाने वाला निहाल कि उसे कितना प्यार किया जाता है। जो उपहार न खरीद पाये, वह खुद को निकम्मा समझे और जिसे तोहफा न मिले, वह अपने आपको दुर्भाग्यशाली। 
सच तो यह है कि उपहार पाने वाला, देने वाला, नहीं पाने वाला और न दे सकने की औकात रखने वाले का रहबर है तो बाजार। बाजार कहता है कि साल के तीन सौ चौंसठ दिन मरती मां को दवा न दो, तीर्थ पर न ले जाओ, उसके पास बैठकर उसकी गोदी में सिर रखकर आराम करने का तुम वक्त न निकाल सको लेकिन मंहगा उपहार देकर यह जरूर जताओ कि बेटा कितना बड़ा सौदागर बन गया है। यही हाल बाकि दिनों के लिये करो। बाजार ने लोगों को ऐसा मोह लिया है कि अब रिश्ता, रिश्ता न होकर वस्तु हो गया है। विनिमय बन गया है। कमाऊ पत्नी अधिक पाने की लालसा में पति को महंगे उपहार देती है तो गृहिणी अपने को प्रूफ करती दिखती है कि उसके उपहार में कितनी चिंता छिपी हुई है। भाई, बहन, मां-बाप अब रिश्ते नहीं, वस्तु हैं और वस्तुओं का विनिमय करना बाजार ने बेहतर ढंग से सिखा दिया है।
बाजार की जकड़ इतनी मजबूत है कि आप छूट नहीं सकते। जहां तक मुझे याद है मेरी मां जीते जी श्राद्ध पक्ष में पंचाग में तिथि देखा करती थी। मेरे पूछने पर बताती थी कि जो हमारा साथ छोड़ गये हैं, उसके लिये श्राद्ध पक्ष में एक एक दिन तय होता है। इस दिन उनके पसंद का खाना बनता है और मंदिरों में दान करने के साथ पक्षियों को भी खिलाया जाता है। विश्वास यह रहता है कि यह खाना मृतात्मा तक पहुंचता है। आज मां नहीं है, भाभी यह रस्म निभा रही है। कल भी मुझे पता नहीं था कि जो खाना मृतक की पसंद के अनुरूप बनता है, वह उसे मिलता है कि नहीं, आज भी मुझे यकिन नहीं है। इतना जरूर है कि यह एक दिन अपनों को याद करने का होता है। बाजार भी कहता है कि अपनों को एक दिन याद करो। दोनों के याद करने में एक फर्क है तो यह कि बाजार कहता है कि जिंदा व्यक्ति को बरस के हर दिन नहीं, एक दिन याद करो और भूल जाओ और हमारी परम्परा कहती है साल में एक दिन याद करो लेकिन दिल से करो। रिश्तों को समझो और उसका मान करना जानो। बाजार कहता है डे के आगे डेथ है और इसके बाद है भूल जाने की परम्परा किन्तु दिवस की परम्परा हमसे कहती है दिवस का अर्थ है रिश्तों को कभी न भूलने की परम्परा। 

Friday, January 20, 2012

अपनी Khabar

भोपाल। मीडिया एवं सिनेमा की द्विभाषी अन्तर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका फरवरी-2012 के अंक के लिये सिनेमा में रूचि रखने वाले पाठकों एवं लेखकों से प्रकाशन सामग्री भेजने का आग्रह किया है। पिछले ग्यारह वर्षों से प्रकाशित समागम के बारहवें वर्ष का यह पहला अंक होगा। इसी महीने सिनेमा के सौ साल पूरे हो रहे हैं लिहाजा समागम का यह अंक सिनेमा पर केन्द्रीत है। समागम के सम्पादक मनोज कुमार ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा है कि सिनेमा के विभिन्न पहलुओं पर केन्द्रीत सिनेमा के इस विशेष अंक में सिनेमा के इतिहास के साथ साथ रीजनल सिनेमा पर भी सामग्री प्रकाशित की जा रही है। सौ पन्नों के इस विशेष अंक के लिये जिन लेखकों और पाठकों के पास सिनेमा के संदर्भ की जानकारी एवं छायाचित्र जो भी उपलब्ध हो, प्रकाशन के लिये भेज सकते हैं।

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